अर्थव्यवस्था और विभाजक राजनीति में व्युत्क्रमानुपाती या उल्टा रिश्ता होता है। एक का बढ़ना दूसरे के लिए घातक है। विभाजक राजनीति बढ़ेगी तो अर्थव्यवस्था का घटना तय है। इस सच को झुठलाने के लिए ही मोदी सरकार ने पहले ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा दिया। इस नारे पर लोगों का विश्वास टूटने लगा तो उसने इसमें ‘सबका विश्वास’ भी जोड़ दिया। वो कथनी में हमेशा समावेशी विकास की बातें करती रही। लेकिन करनी में व्यापक अवाम को दरकिनार कर मुठ्ठी भर हितों की सेवा करती रही। अर्थव्यवस्था तब बढ़ती है, जब अवाम के बीच का हर दरमियानी फासला मिटा दिया जाए। हर कोई एक दूसरे के लिए काम करें और काम या सेवा के बदले उसे वाजिब दाम मिले। इस तरह अर्थव्यवस्था देश से निकल कर विदेश तक बढ़ती चली जाती है। इस वृद्धि को समाहित करने के लिए रिजर्व बैंक नोट छापता जाता है। अर्थव्यवस्था में लेनदेन के साथ ही मुद्रा प्रसार बढ़ता जाता है। रिजर्व बैंक अतिरिक्त नोट न सर्कुलेशन में लाए तो उत्पाद व सेवाएं महंगी हो जाएगी। ऐसी मुद्रास्फीति को थामने के लिए वो नोट लाकर अर्थव्यवस्था में संतुलन बनाए रखता है। लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने सत्ता के विस्तार के लिए विभाजक राजनीति का सहारा लिया। राजनीति में वो सफल होती गई। लेकिन अर्थव्यवस्था तबाह हो गई। अब सोमवार का व्योम…
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