सरकार की तरफ से जारी आंकड़े भारतीय परिवारों की बड़ी ठंडी और बेजान तस्वीर पेश करते हैं। लेकिन उससे परे जाकर देखें तो पता चलता है कि भारतीय परिवार वित्तीय सुरक्षा हासिल करने के लिए जबरदस्त हाथ-पैर मार रहे हैं। वित्तीय आस्तियों में लोगों के पास उपलब्ध कैश, बैंक डिपॉजिट और अन्य वित्तीय निवेश शामिल हैं, जबकि देनदारियों में बैंकों और अन्य स्रोतों से लिये गए ऋण शामिल हैं। वित्तीय आस्तियों से देनदारियां घटा दें तो भारतीयऔरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार की कमान भले ही कुछ दशकों से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के हाथों में चली गई हो। लेकिन इसकी गति अंततः ‘हम भारत के लोग’ ही तय करेंगे, क्योंकि विदेशी निवेशकों का हाल तो यही है कि गंजेड़ी यार किसके, दम लगाकर खिसके। वे तो मुनाफा कमाकर खिसक लेंगे। इसलिए यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि फिलहाल हम भारतीयों की बैलेंस शीट या कहें तो वित्तीय आस्तियों और देनदारियों का क्या हिसाब चलऔरऔर भी

दुनिया एक बार फिर ट्रम्प द्वारा छेड़े गए टैरिफ युद्ध की दहशत में है। दक्षिण कोरिया व जापान पर 25%, ब्राज़ील पर 50%, मेक्सिको व यूरीपीय संघ पर 30% और यहां तक कि कनाडा पर 35% टैरिफ की धमकी। भारत-अमेरिका व्यापार संधि भी अनिश्चितता के घेरे में है। कुछ भी साफ नहीं। ट्रम्प ने भारत से कॉपर आयात पर 50% और दवाओं के आयात पर 200% तक टैरिफ लगाने की हुंकार भर रखी है। ऐसे में भलेऔरऔर भी

देश में जीडीपी के साथ और जीडीपी के नाम पर ऐसा खेल चल रहा है, जिसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और बड़े-बड़े अर्थशास्त्री नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, जबकि अवाम बबूचक बना हुआ है। इस बीच अबूझ पहेली है कि जब सब कुछ इतनी तेज़ी से बढ़ रहा है तो आम उपभोक्ता ही नहीं, कॉरपोरेट क्षेत्र तक में क्षमता इस्तेमाल का स्तर और लाभप्रदता अटकी क्यों है? यकीनन भारत इस समय दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। आईएमएफऔरऔर भी

गजब की विडम्बना है। एक तरफ भारत सरकार अपना 96% ऋण देश के आम लोगों की बचत या बैंक डिपॉजिट से हासिल कर रही है, वहीं दूसरी तरफ इन्हीं आम लोगों को घर-खर्च और खपत को पूरा करने के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है। रिजर्व बैंक की ताज़ा फाइनेंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट बताती है कि मार्च 2025 तक भारतीय परिवारों ने जो ऋण ले रखा है, उसका 54.9% हिस्सा घर या जेवरात खरीदने के लिए नहीं, बल्किऔरऔर भी