बाज़ार अबकी पहले जितना तो नहीं गिरा
बाज़ार थमने का नाम ही नहीं ले रहा। न जाने कब इस रात की सुबह होगी? यह सवाल आज शेयर बाज़ार के हर निवेशक व ट्रेडर के दिलो-दिमाग में नाच रहा है। हर तरफ घबराहट व अफरातफरी का आलम है। सरकारी अर्थशास्त्री से लेकर शेयर बाज़ार व म्यूचुअल फंड के धंधे में लोग समझाने में लगे हैं कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) का स्वभाव ही संकट में निकल भागने का है। करीब डेढ़ महीने से एफपीआई केऔरऔर भी
अभी जो बदहाल, सोचें भविष्य का हाल
आपने अगर रिसर्च के आधार शेयर बाज़ार में निवेश करने की समझ और आदत बना ली तो बहुत अच्छा। तब धीरे-धीरे आपको कंपनियों और उनके धंधे की समझ बढ़ती जाएगी। तब आप उनके मूल्यांकन का गणित भी समझने लगेंगे। शुरू में ही आपको ईपीएस और पी/ई का महत्व पता लगने लगेगा। यह भी थोड़े समय में आप जान जाएंगे कि बैंकिंग व फाइनेंस कंपनियों में ईपीएस और पी/ई नहीं, बल्कि प्रति शेयर बुक वैल्यू (बीपीएस) और पी/बीऔरऔर भी
रुपया रसातल में, क्यों नहीं बढ़ा निर्यात!
चार साल पहले कोरोना में फंसने के बाद जबरदस्त शोर मचा कि चीन से दुनिया के तमाम देश दूरी बना रहे हैं और ‘चाइना प्लस वन’ की नीति अपना रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा फायदा भारत को मिलेगा। लगा कि भारत अब दुनिया भर में फैले चीन के निर्यात बाज़ार पर कब्ज़ा कर लेगा। लेकिन यह भी मोदी सरकार के देश के भीतर उछाले गए तमाम जुमलों की ही तरह अंतरराष्ट्रीय सब्ज़बाग व बड़बोलापन साबित हुआ। चीनऔरऔर भी
चीन ऐसे बना भारत से ज्यादा आकर्षक
चीन सरकार द्वारा घोषित किया गया 1.4 लाख करोड़ डॉलर का पैकेज़ डेढ़ महीने के भीतर उठाया गया दूसरा बड़ा कदम है। इसका लगभग 60% हिस्सा स्थानीय सरकारों को छिपे हुए ऋणों से मुक्ति दिलाने के लिए है। इससे पहले वहां की सरकार बैंकों के लिए ज्यादा धन और घर खरीदनेवालों को टैक्स में रियायत दे चुकी है। वेल्थ व निवेश प्रबंधन में लगी वैश्विक वित्तीय फर्म नोमुरा का आकलन है कि चीन का वित्तीय प्रोत्साहन पैकेजऔरऔर भी






