बेरोज़गारी के सारे पैमाने भारत में फेल!
अपने भारत की ज़मीनी हकीकत यह है कि यहां बेरोज़गारी के सारे आंकड़े व पैमाने फेल हो जाते हैं। दुनिया भर में बेरोज़गारी दर की परिभाषा यह है कि 15 साल से ऊपर की कामकाज़ी उम्र के जितने लोग काम की मांग कर रहे हैं, उनमें से कितने प्रतिशत लोगों को काम नहीं मिल रहा। जितने लोग काम मांग रहे हैं, उनकी कुल संख्या को देश की श्रमशक्ति भी कहा जाता है। अपने यहां विचित्र स्थिति हैऔरऔर भी
बढ़ रहा विकास, मगर श्रम का दाम नहीं
माना जाता है कि अर्थव्यवस्था बढ़ेगी तो रोज़गार के नए असर पैदा होंगे और काम करनेवालों को अपने श्रम का बेहतर दाम मिलेगा। लेकिन अपने यहां तो कबीर की उलटबांसियां ही चल रही हैं। वित्त वर्ष 2014-15 से 2021-22 तक हमारा जीडीपी 5.35% की औसत सालाना रफ्तार से बढ़ा है। लेकिन रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान वास्तविक मजदूरी 1% सालाना से भी कम दर से बढ़ी है। यह कृषि मजदूरों के लिए 0.9%, कंस्ट्रक्शनऔरऔर भी
लम्बे निवेश में सट्टा नहीं, चले विश्लेषण
एक बात हमें अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि हम कितनी भी मशक्कत कर लें, निवेश में सफलता रातोंरात नहीं मिलती। इसके लिए समय, अनुशासन व धैर्य की दरकार होती है। अगर आपको लगता है कि शेयर बाज़ार से खटाखट नोट कमाने का कोई फॉर्मूला है तो यह विचार फौरन जेहन से निकालकर दूर फेंक दें। साथ ही हमें निवेश और सट्टेबाज़ी के अंतर को साफ समझ लेना चाहिए। शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग एक तरह का सट्टाऔरऔर भी
कम श्रम भागीदारी, ऊपर से बेरोज़गारी!
भारत जैसा शानदार डेमोग्रैफिक डिविडेंड वाला देश अगर अपनी पूरी श्रमशक्ति का उपयोग नहीं कर रहा है तो अर्थव्यवस्था अपनी संपूर्ण संभावना कतई नहीं हासिल कर सकती। हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दम भरते हैं। लेकिन ‘द इकनॉमिस्ट’ पत्रिका के मुताबिक दुनिया में केवल नौ देश हैं जहां बेरोज़गारी की दर भारत से ज्यादा है। ये देश हैं ग्रीस, इटली, स्पेन, तुर्किए, ब्राज़ील, चिली, कम्बोडिया, मिस्र व सऊदी अरब। वो भी तब, जबऔरऔर भी






