श्रम बाज़ार में बढ़ गए, श्रम शक्ति में नहीं
श्रम बाज़ार में स्नातकों की बढ़ती शिरकत यकीनन शुभ संकेत है। लेकिन देश की श्रमशक्ति में उनका हिस्सा अब भी काफी संकुचित है। कोरोना से आने से पहले सितंबर-दिसंबर 2019 में यह हिस्सा 13.2% हुआ करता था। कोरोना के दौरान जनवरी-अप्रैल 2020 में थोड़ा-सा बढ़कर 13.7% हो गया। लेकिन सितंबर-दिसंबर 2020 में घटकर 11.7% पर आ गया। लेकिन उसके बाद भी 12% के आसपास ठहरा हुआ है, जबकि श्रम बाज़ार में उनीक भागीदारी बढ़ गई है। इसकीऔरऔर भी
श्रम बाज़ार में बढ़ा ग्रेजुएट्स का आना
अच्छी बात यह है कि अपने यहां ग्रेजुएट युवक-युवतियां थक-हारकर घर बैठ जाने के बजाय नौकरी मांगने के लिए श्रम बाज़ार में पहले से ज्यादा उतरने लगे हैं। हालांकि आमतौर पर काम मांगनेवाले श्रमिकों का श्रम बाज़ार में आना घटा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में श्रम भागीदारी की दर (एलपीआर) वित्त वर्ष 2016-17 में 46.2% हुआ करती है। यह बीते वित्त वर्ष 2022-23 में घटकर 39.5% पर आ गई है। लेकिन बेरोज़गारी की ऊंची दरऔरऔर भी
सपना आसमान का, सच्चाई पाताल की
शिक्षा का स्तर बढ़ने से श्रम भागीदारी की दर बढ़ जाती है। लेकिन इसी के साथ बेरोज़गारी की दर भी बढ़ती जाती है। मसलन, 5वीं तक पढ़े लोगों में बेरोज़गारी की दर महज 1% है, जबकि उनकी श्रम भागीदारी दर 30% है। छठीं से नौवीं तक पढ़े लोगों की श्रम भागीदारी 37.6% और बेरोजगारी 2% से कम है। जो 10वीं से 12वीं तक पढ़े हैं, उनकी श्रम भागीदारी 40% और बेरोज़गारी 10.9% है। ग्रेजुएट्स की श्रम भागीदारीऔरऔर भी
ज्यादा पढ़े-लिखे को काम मिलना कठिन
जो जितना ज्यादा पढ़-लिख लेता है, उसे देश के भीतर काम मिलना उतना ही मुश्किल हो जाता है। इसकी तस्दीक करते हैं बेरोज़गारी के आंकड़े। सीएमआईई के मुताबिक, भारत में बेरोज़गारी की औसत दर 7.5% चल रही है। लेकिन अगर ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट व इंजीनियरों वगैरह की बेरोजगारी को अलग से गिनें तो उनका आंकड़ा 17.2% निकलता है। यूं तो जिनकी अधिकतम पढ़ाई 10वीं से 12वीं तक हुई है, उनमें भी ज्यादा बेरोज़गारी है, फिर भी उनकीऔरऔर भी






