आशावाद अच्छी चीज़ है। लेकिन इसे झूठ नहीं, सच आधारित होना चाहिए। विश्व बैंक व आईएमएफ से लेकर रेटिंग एजेंसियों के आकलन के विपरीत भारतीय रिजर्व बैंक कहता है कि हमारी अर्थव्यवस्था ज्यादा बढ़ेगी। इसी तर्ज में मौसम विभाग भी कह रहा है कि इस बार मानसून में दीर्घकालिक औसत (एलपीए) की 96% बारिश होगी, जिसे सामान्य माना जाएगा। उसके मुताबिक, अल-निनो का असर हुआ भी तो जुलाई से सितंबर तक की अवधि के आखिरी हिस्से मेंऔरऔर भी

बिजनेस करना खेती करने जैसा आसान नहीं कि खेत तैयार कर बीज डाल आए, खाद-पानी व कीटनाशक का बराबर इंतजाम किया और मौसम ठीक रहा तो तय समय पर फसल काटकर घर ले आए। बिजनेस में भी व्यापार करना अपेक्षाकृत आसान है जिसमें थोक के भाव माल खरीदकर रिटेल के भाव में बेच मुनाफा कमा लिया जाता है। बिजनेस करने की असली चुनौती है मैन्यूफैक्चरिंग में, जिसमें फैक्टरी लगाकर आप उत्पादन करते हो। कच्चा माल हासिल करनेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार हमें ट्रेडिंग और निवेश से कमाने का मौका ही नहीं देता, वो हमें देश की अर्थव्यवस्था के अंग-अंग के साथ ही दुनिया की अर्थव्यवस्था और वित्तीय जगत को भी जानने-समझने को उकसाता है क्योंकि हम देश-दुनिया के आर्थिक व वित्तीय हालात को जितनी अच्छी तरह से जानेंगे, शेयर बाज़ार से जुड़े हमारे फैसले उतने ही सटीक हो सकते हैं। हमें जानना चाहिए कि मौसम विभाग ने इस बार मानसून में 4% कम बारिश की आशंकाऔरऔर भी

कहते हैं कि चीन के आंकड़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन इधर अपने भी आंकड़े दिखाते कम और छिपाते ज्यादा है। मसलन, नया आंकड़ा आया है कि मार्च में थोक मुद्रास्फीति की दर घटकर 29 महीनों के न्यूनतम स्तर 1.34% पर आ गई है। मार्च में रिटेल मुद्रास्फीति भी रिजर्व बैंक द्वारा तय 6% की ऊपरी सीमा के भीतर 5.66% पर आ चुकी है। क्या इसका मतलब यह कि महंगाई की मार घट रही है?औरऔर भी