अनिश्चितता से भरी दुनिया है तो धंधे में भी ऊपर-नीचे चलता रहता है। कभी तेज़ तो कभी मंदा। कंपनियों के शेयर सीधे-सीधे उसके धंधे से प्रभावित होते हैं तो अगर उसमें ऑपरेटर सक्रिय न हों तो धंधे के मंदा पड़ते ही शेयर भी ठंडे पड़ने लगते हैं। ऐसे में लम्बे समय के निवेशक को क्या करना चाहिए? नियम व समझदारी कहती है कि अगर किसी भी वजह से कोई शेयर हमारे खरीद मूल्य से 25% तक गिरऔरऔर भी

हमारा मौसम विभाग अल-निनो के आसन्न खतरे से भले ही इनकार कर रहा है। लेकिन सारी दुनिया में इसको लेकर हाहाकार मचा हुआ है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक अन-निनो से के उपजी असामान्य गरमी से आमतौर पर ठंडे रहनेवाले यूरोप में बीते साल 2022 के दौरान 15,000 लोगों की मौत हो गई। भारत में अभी जबरदस्त गरमी की लहर चल रही है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु में होऔरऔर भी

अल-निनो मध्य प्रशांत महासागर में तापमान के बढ़ने की एक चक्रीय परिघटना है। भारत पर इसके आने का असर यह होता है कि दस सालों में से छह साल में देश के पश्चिमी, उत्तर-पश्चिम व मध्य-भारत के पश्चिमी हिस्से में कम बारिश होती है। साल 1951 से 1922 तक के 71 सालों में 15 साल अल-निनो के रहे हैं। इस दौरान मध्य व भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में तापमान आधा डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ गया। इससे नौऔरऔर भी

हमारे मौसम विभाग का तर्क है कि यकीनन अल-निनो की तलवार इस बार के मानसून के सिर पर अटकी है। लेकिन कुछ कारक उसके असर को निष्क्रिय कर सकते हैं। इसमें से एक प्रमुख कारक हिंद महासागर का डाइपोल (आईओडी) है। इसके अंतर्गत होगा यह कि अरब सागर में तापमान गरम थोड़ा रहेगा। इससे अगस्त से सितंबर तक भारत में नमी ज्यादा रहेगी और भरपूर बारिश होगी। इससे अल-निनो का असर काफी कम हो जाएगा। केंद्र सरकारऔरऔर भी

इस बार औसत बारिश नहीं होने की आशंका निजी मौसम निगरानी संस्था स्काईमेट ने भी जताई है। उसका आकलन है कि इस बार मानसून सामान्य नहीं, बल्कि उससे कमज़ोर रहेगा और बारिश औसत की 94% ही हो सकती है। ऐसा अल-निनो के चलते होगा। इसके असर से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में काफी कम बारिश होगी और सूखे के हालात बन सकते हैं। नतीज़तन, खरीफ की फसलों पर बुरा असर पड़ेगा। धान से लेकर मोटेऔरऔर भी