हम सामाजिक ही नहीं, आर्थिक व वित्तीय जीवन के बड़े विचित्र दौर से गुज़र रहे हैं। विश्व अर्थव्यवस्था लस्त-पस्त है। सस्ती ब्याज दरों की चादर के नीचे मुद्रास्फीति का अजगर कुलकुला रहा है। आर्थिक विषमता सामाजिक अशांति का बारूद सुलगाए पड़ी है। कोरोना की दूसरी लहर ने बनती संभावनाओं के सारे समीकरण तोड़ डाले हैं। देश के भीतर अंधेर नगरी, चौपट राजा का हाल है। यहां कोरोना वैक्सीन की किल्लत है, लेकिन सत्ताशीर्ष पर बैठे लोग नऔरऔर भी

जिन्होंने शेयर बाज़ार में पांच-दस साल के लिए धन लगाया है, उन्हें परेशान होने की ज़रूरत नहीं। लेकिन जो खटाखट मुनाफा बटारने के लिए बाज़ार में कूदे हैं, उन्हें फिलहाल झटपट निकल लेना चाहिए। दरअसल, अपने शेयर बाज़ार का गुब्बारा इतना फूल चुका है कि कभी भी फट सकता है। अर्थव्यवस्था रसातल तो शेयर बाज़ार सातवें आसमान पर! इसमें भी जबरन चढ़ाई गई बर्जर किंग इंडिया, अडानी ग्रीन एनर्जी और रामदेव की 15 कटोरी दाल, 17 गिलासऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की गली भयंकर रिस्क से भरी है। इस हकीकत को कभी नकारना नहीं चाहिए। यहां एक डिग्री ज्यादा रिस्क तभी लें, जब कम के कम दो डिग्री रिवॉर्ड मिलने की संभावना हो। जानकार मानते हैं कि मौजूदा स्थिति में बाज़ार में कोई गुब्बारा नहीं है। बहुत हुआ तो सेंसेक्स और निफ्टी 20% तक गिर सकते हैं। लेकिन इसे करेक्शन कहा जाएगा। साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद जिस तरह अमेरिका से लेकर यूरोप वऔरऔर भी

हमेशा याद रखें। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग ‘ज़ीरो-सम गेम’ है। किसी का नुकसान, दूसरे का फायदा। यहां पक्का कुछ नहीं, सिर्फ और सिर्फ प्रायिकता चलती है। लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का। मोटा-सा नियम कि जिस स्टॉक को खरीदने की आतुरता ज्यादा, वो बढ़ेगा और जिसे बेचने की व्यग्रता ज्यादा, वो गिरेगा। यह भी ध्यान रहे कि देशी-विदेशी संस्थाओं की खरीद या बिकवाली से ही शेयरों के भाव पर असर पड़ता है। प्रोफेशनल ट्रेडर यही पकड़नेऔरऔर भी