शेयरों की एक लागत निवेशक धन से अदा करता है। दूसरी लागत भावनाओं से चुकाता है। बाज़ार टूटता है तो उसका कलेजा निकल जाता है। खासकर तब, बड़ी समझ व उम्मीद से खरीदे शेयर अचानक दो कौड़ी के हो जाते हैं, पेन्नी स्टॉक्स। मूलधन भी नहीं निकलता। जो बढ़ते हैं, उन्हें लंबा निवेश मानकर वह बस देखता है, बेचता नहीं। इसीलिए कहते हैं पहले कंपनी को परखो, तब शेयर को देखो। अब तथास्तु में आज की कंपनी….औरऔर भी