गंगोत्री से गंगा की धारा के साथ बहते पत्थर का ऊबड़-खाबड़ टुकड़ा हज़ारों किलोमीटर की रगड़-धगड़ के बाद शिव बन जाता है, मंगल का प्रतीक बन जाता है। आंख में ज़रा-सा कण पड़ जाए तो हम इतना रगड़ते हैं कि वह लाल हो जाती है। लेकिन सीप में परजीवी घुस जाए तो वह उसे अपनी लार से ऐसा लपटेती है कि मोती बन जाता है। ऐसे ही हैं हमारे रीति-रिवाज़ और त्योहार जो हज़ारों सालों की यात्राऔरऔर भी

दीपावली का चक्र है। ऋतुओं का चक्र है। दीपावली को हम भले ही धन की देवी लक्ष्मी से जोड़ दें, लेकिन इसका असली वास्ता खेती के चक्र से रहा है। वहीं, धन का कोई चक्र नहीं होता। जहां से शुरू करो, वहीं से उसका चक्र बन जाता है। दीपावली का बहाना अच्छा है। कमाने का ख्याल अच्छा है। लेकिन सतर्क बुद्धि और सही दांव से कभी भी कमाया जा सकता है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी