लालच, लिप्सा या तृष्णा हमारा विवेक हर लेती है, दिमाग बंद कर देती है, आंखों पर काला-घना परदा डाल देती है। लगता है कि चांद पेड़ की फुनगी पर ही बैठा है। सीढ़ी लगाकर या किसी तरह चढ़कर वहां पहुंच गए तो चांद अपनी मुठ्ठी में होगा। यह अगर ‘मैया मैं तो चंद्र खिलौला लइहौं’ जैसा बाल-हठ होता तो चल जाता। लेकिन बड़े ऐसा बचपना करने लग जाएं तो सर्व-सत्यानाश हो जाता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी