अर्थव्यवस्था की चिंताजनक हालत सरकारी आंकड़ों तक में बोलने लगी है। चालू वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में केंद्र का कुल टैक्स संग्रह मात्र 1.36% बढ़ा है। यह पिछले एक दशक में टैक्स बढ़ने की सबसे कम दर है। बजट में इस साल के लिए लक्ष्य 18.6% ज्यादा टैक्स जुटाने का है। यह लक्ष्य हासिल करने के लिए बाकी तीन तिमाहियों में टैक्स संग्रह 22.3% बढ़ना चाहिए जो कतई संभव नहीं दिखता। अब मंगलवार की दृष्टि..औरऔर भी

शंख कितनी भी जोर से बजा लिया जाए, पर ‘अश्वत्थामा हतो, नरो वा कुंजरो वा’ का सच अब छिपाना संभव नहीं है। राहुल बजाज से लेकर लार्सन एंड टुब्रो के चेयरमैन ए.एम. नाइक और एचडीएफसी के चेयरमैन दीपक पारेख तक चेताने लगे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था धीमेपन का शिकार हो चुकी है। अर्थव्यवस्था के विकास को लेकर विश्वास डगमगा गया है। बैंक उधार देने से हिचक रहे हैं और सुरक्षित चलना चाहते हैं। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

जब टाटा स्टील से लेकर मारुति सुज़ुकी जैसे स्टॉक्स 52 हफ्ते की तलहटी पर टहल रहे हों, तब शेयर बाज़ार को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक है। यह भी चिंता की बात है कि शेयर गिर जाने के बाद दोबारा पुराना शिखर नहीं पकड़ पाते। अगर इसकी खास वजह कंपनी के बिजनेस मॉडल का अप्रासंगिक हो जाना हो, तब बात अलग है। अन्यथा, उनके उठने की संभावना तो बनी ही रहती है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

शेयर बाज़ार का मौजूदा माहौल लालच और डर से फांस-दर-फांस भरा पड़ा है। अक्सर लगता है कि दांव लगा लो तो डूबने की कोई गुंजाइश नहीं। लेकिन अगले ही दिन शेयर 10% से ज्यादा डूब जाता है और कई दिनों तक डूबता ही रहता है। ऐसे में सीधा-सरल नियम है अनुशासन व रणनीति पर डटे रहना। आपने न्यूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न के लिए जो नियम बना रखे हैं, उन पर अडिग रहना। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

इस समय बाज़ार में जो स्थिति है, वह बड़ी भ्रामक है। बमुश्किल 50-100 शेयर हैं जो कुलांचे मारे जा रहे हैं। वहीं, बाकी डेढ़ हज़ार से ज्यादा शेयर रसातल का रुख किए हुए हैं। ऐसे शेयर जब कभी थोड़ा-बहुत बढ़ते भी हैं तो फौरन मुनाफावसूली से दबा दिए जाते हैं। बाज़ार की हालत देखकर समझदार लोगों का कहना है कि इस वक्त रिस्क लेने के बजाय कैश संभालकर रखना सबसे सुरक्षित पोजिशन है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी