इधर कई सालों से मुद्रास्फीति कम चल रही है। इससे आम लोगों की बचत बढ़नी चाहिए थी। लेकिन हाउसहोल्ड बचत बीते दस साल में जीडीपी के 23.6% से घटकर 17.2% पर आ गई, जबकि इनकी देनदारियां बेतहाशा बढ़ गई हैं। लोगबाग कर्ज लेकर अपनी खपत का इंतज़ाम कर रहे हैं। 2015-16 से 2017-18 तक के मात्र दो साल में उनका कर्ज 3.85 लाख करोड़ से लगभग दोगुना 7.41 लाख करोड़ रुपए हो गया। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

रिजर्व बैंक बराबर ब्याज दर घटा रहा है। फिर भी इस साल अप्रैल-जून की तिमाही में कॉरपोरेट क्षेत्र को 22.16% ज्यादा ब्याज अदा करना पड़ा। ये आंकड़ा 2179 कंपनियों के सैम्पल पर आधारित है। इन कंपनियों का शुद्ध लाभ इस दौरान 11.97% घट गया तो उन्होंने सरकार को 10.48% कम टैक्स दिया। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें उद्योग से लेकर उपभोक्ता और सरकार, सभी के सभी फंसे हुए नज़र आ रहे हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

आर्थिक विकास के चार इंजिन होते हैं। सरकारी खर्च, निजी निवेश, निजी खपत और निर्यात। इन चारों इंजिनों की हालत बड़ी संगीन दिख रही है। सरकार को टैक्स भरपूर नहीं मिल रहा तो वह खर्च कहां से बढ़ाएगी। उधार के लिए विदेश की शरण लेने तक की पेशकश हो चुकी है। विश्व अर्थव्यवस्था में मंदी के आसार हैं तो हम निर्यात बढ़ा नहीं सकते। बचा निजी निवेश और खपत तो वहां भी सन्नाटा! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अगर खुदा-न-खास्ता अमेरिका में मंदी आती है तो पूरी दुनिया पर इसका असर पड़ेगा। चीन, जापान व यूरोप में पहले से कमज़ोरी चल रही है। ऐसा होने पर भारतीय निर्यात के बढ़ने की रही-सही आशा भी खत्म हो जाएगी। वैसे भी अपना निर्यात सुस्ती का शिकार हो चुका है। चालू वित्त वर्ष 2019-20 से अप्रैल-जुलाई के पांच महीनों में यह साल भर पहले की समान अवधि की तुलना में मात्र 3.13% बढ़ा है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

आर्थिक मोर्चे से खराब खबरों का आना थम नहीं रहा। घरेलू अर्थव्यवस्था के बाद अब विदेश से भी चिंताजनक संकेत मिलने लगे हैं। अमेरिका में दशकों बाद छोटी अवधि के बांड लंबी अवधि के बांडों से सस्ते हो गए हैं यानी, छोटी अवधि के बांडों पर ज्यादा अवधि के बांडों से ज्यादा ब्याज मिलने लगी है। इसे आर्थिक मंदी का संकेत माना जाता है। हालांकि विशेषज्ञ कह रहे हैं कि मंदी नहीं आनेवाली। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी