शेयर बाज़ार विशुद्ध धंधा है। वहां बुद्धि की तलवार लेकर भावनाओं से खेलना स्वाभाविक है। मगर, राजनीति पहले धंधा नहीं, सेवा हुआ करती थी। उसे अब भी ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन आज का कड़वा सच है कि धर्म की तरह राजनीति भी सबसे कम समय में सबसे ज्यादा कमाने का धंधा बन गई है। इसमें सच नहीं, महज झांकी पेश की जाती है। विज्ञापनों के शोर में सच गायब हो जाता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

जो भावनाओं में बहता है, वो हारता है और जो भावनाओं से खेलता है, वो जीतता है। राजनीति और शेयर बाज़ार, दोनों का सच यही है। राजनीति और शेयर बाज़ार में धंधा करनेवाले लोग भावनाओं को समझकर उनसे खेलते हैं। हम टीवी चैनलों पर जो एक्जिट पोल देखते हैं, वह भी धंधा है, उसी तरह जैसे एनालिस्ट बिजनेस चैनलों पर अपना ज्ञान बघारते हैं। सही निकल गया तो वाह-वाह। गलत निकला तो सन्नाटा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार से आप ज्यादा रिटर्न महज इसलिए नहीं कमाते कि आपने बहुत जटिल बिजनेस मॉडल वाली कंपनी में निवेश किया है। कंपनी ऐसी होनी चाहिए जिसका बिजनेस मॉडल आपको अच्छी तरह समझ में आ जाए। साथ ही उसके धंधे में एंट्री बैरियर इतना तगड़ा होना चाहिए कि दूसरा आसानी से घुस न पाए। वह एक-एक कदम भी बढ़ती रही तो काफी है, दस कदम की छलांग लगाने की ज़रूरत नहीं। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

शेयर बाज़ार के इतिहास की किताबें पढ़ने में बड़ा वक्त लगता है। इसलिए कुछ व्यावहारिक लोग शेयरों के भाव के लॉन्ग-टर्म चार्ट को ही देखकर अपनी समझ बनाते हैं। लेकिन एक बात गांठ बांध लें कि शेयर बाज़ार से धन कमाना ऊपर-ऊपर सैद्धांतिक रूप से जितना आसान लगता है, असल में वैसा कतई नहीं है। अपनी अधीरता व अवास्तविक उम्मीदों से हमें लड़ना होता है, गलत लोगों की सलाह से बचना पड़ता है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में अभी जो चल रहा है, वह दरअसल क्या है? उथल-पुथल भरे माहौल में किन कदमों से बचना चाहिए? निवेश व ट्रेडिंग के सबसे अच्छे अवसरों को कैसे पकड़ा जाए? यह समझ व विद्या हासिल करने के लिए हमें दुनिया भर के शेयर बाज़ार के इतिहास को पढ़ना चाहिए। आप गूगल करेंगे तो इस पर कई अच्छी किताबें मिल जाएंगी। उसे अपने अनुभव से मिलाकर आप समग्र समझ बना सकते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…और भीऔर भी