भारतीय अर्थव्यवस्था की मूल ताकत उसका घरेलू बाज़ार और खपत है। यह बाज़ार इतना बड़ा है कि भारत को कहीं बाहर झांकने की ज़रूरत नहीं। इसलिए सही मायने में कहें तो भले ही दुनिया ग्लोबल हो गई हो और माल व सेवाओं के आयात-निर्यात की खास भूमिका हो, भारतीय लोग बाहर और बाहर के लोग यहां बेधड़क आते जा रहे हों, लेकिन भारत की सेहत पर विश्व अर्थव्यवस्था का खास फर्क नहीं पड़ता। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सवाल उठता है कि आर्थिक विकास को गति देने के मामले में गठबंधन की सरकारें आखिर एकदलीय सरकारों से बेहतर काम क्यों करती हैं? इसका एक कारण यह हो सकता है कि एकदलीय सरकार को अपनी सत्ता का दंभ होता है। इसलिए वो मुठ्ठी भर नेताओं के दिमाग या सत्ता समीकरण को साधने की नीयत से मनमर्जी से नीतियां थोपती हैं, जबकि गठबंधन सरकारों को मजबूरी में सबको साथ लेकर चलना पड़ता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

मोदीराज में आर्थिक विकास दर का 39 सालों की औसत दर से कम रहना साबित करता है कि एकदलीय सरकारों की उपलब्धि गठबंधन सरकारों से खराब रही है। हम पाते हैं कि केंद्र में 1980 के बाद चार में से चार एकदलीय सरकारों का प्रदर्शन कमतर रहा, जबकि छह में से तीन गठबंधन सरकारों ने 6.3% सालाना के दीर्घकालिक औसत से बेहतर प्रदर्शन किया है। इतिहास का यह सबक हमें याद रखना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

मोदी सरकार है तो गठबंधन सरकार। लेकिन चूंकि भाजपा ने 2014 के चुनावों में अपने दम पर पूरा बहुमत पाया और चुनाव-पूर्व गठबंधन का कोई सदस्य इसके मंत्रिमंडल में नहीं है, इसलिए हम इसे एकदलीय सरकार मान सकते हैं। इसके कार्यकाल में औसत आर्थिक विकास दर नई सीरीज के मुताबिक 7.4% रही है जो पहले के पैमाने पर 1.5% कम 5.9% निकलती है। यह 39 सालों की औसत दर 6.3% से कम है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

पिछले 39 सालों में केंद्र में शासन करनेवाली दस सरकारों में से सात गठबंधन की मिलीजुली सरकारें थीं। इनमें से छह सरकारों ने उन तीन सरकारों से ज्यादा आर्थिक विकास दर हासिल की जो किसी एक दल के बहुमत में चलाई जा रही थीं। केवल दिसंबर 1989 से जून 1991 तक, जब केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार थी, तभी हमारी आर्थिक विकास दर कम रही थी। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी