सरकारें आती हैं, जाती हैं। इसी तरह घोटाले आते हैं, जाते हैं। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की निहित संभावना के पूरी तरह निखरने पर खास फर्क नहीं पड़ता। हां, थोड़ी देर हो सकती है। लेकिन भारत की विकासगाथा को परवान चढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। इसलिए आम निवेशक के लिए यही बेहतर होगा कि हवाबाज़ी या घबराहट में आए बगैर वो अच्छी कंपनियों के स्वामित्व में अपना छोटा हिस्सा जुटाता जाए। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

बजट से कल तक सेंसेक्स 4.48% गिर चुका है और वो 24.45 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। लेकिन इसी दौरान स्मॉलकैप सूचकांक 2.45% और मिडकैप सूचकांक 2.71% ही गिरा है, जबकि ये क्रमशः 106.74 और 39.90 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहे हैं। जाहिर है कि आसमान पर चढ़े स्मॉलकैप और मिडकैप कंपनियों के शेयर नीचे उतरने का नाम ही नहीं ले रहे। मगर, देर-सबेर इनका गिरना तय है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हमारा शेयर बाज़ार मूल्यांकन के खतरनाक ज़ोन के काफी करीब है। इसे बाज़ार पूंजीकरण और जीडीपी के अनुपात से समझा जा सकता है। बीएसई का बाज़ार पूंजीकरण कल 1.49 लाख करोड़ रुपए रहा, जबकि बजट में बाज़ार मूल्य पर जीडीपी का संशोधित अनुमान 1.67 लाख करोड़ रुपए का है। इस तरह दोनों का अनुपात 89.22% बनता है। यह अनुपात 2008 में जब 100% के पार चला गया था तो सेंसेक्स 38% टूटा था। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बजट के बाद से हमारा शेयर बाज़ार जिस तरह रह-रहकर हिचकोले खा रहा है, वह सिलसिला आखिर कब तक चलेगा? क्या वह आगे और ज्यादा नहीं गिर सकता या भारतीय अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित ताकत उसे चढ़ाती जाएगी? इन सवालों का जवाब फौरन नहीं दिया जा सकता। उधर, साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद विश्व बाज़ार में छोड़ी गई सस्ती पूंजी वापस खींची जा रही है। सस्ते धन का स्रोत सूख रहा है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी