कोई गिरा हुआ शेयर हमारे जैसे हज़ारों लोग भी खरीद लें तो वह गीली फुलझड़ी की तरह ज़रा-सा जलकर फिर बुझ जाएगा क्योंकि निकलने की ताक में लगे पिछले खरीदार भाव बढ़ने पर बेचने लग जाएंगे। शेयर तभी बराबर बढ़ता है जब उसमें बैंकों, म्यूचुअल फंडों व बीमा कंपनियों जैसी संस्थाओं और प्रोफेशनल ट्रेडरों की खरीद आने लगती है। परखें कि बेचने को बचे हैं कितने बेताब और संस्थाएं खरीद शुरू करेंगी क्या! अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

अगर दक्ष प्रबंधन और मजबूत मूलाधार वाली कंपनी का शेयर गिर गया हो तो उसके निवेश करना लंबे समय में फायदे का सौदा साबित हो सकता है। लेकिन कोई शेयर अगर छह-आठ महीने से बराबर गिरता जा रहा है तो सस्ता समझकर उसमें ट्रेडिंग करना बड़ा महंगा पड़ता है। मगर, क्या किया जाए! दूध के जले भी पेन्नी स्टॉक्स के चक्कर में पड़ जाते हैं। ट्रेडिंग और निवेश के बुनियादी सूत्र भिन्न हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

धंधे की दुनिया है। यहां कुछ भी मुफ्त नहीं। लेना-देना ही व्यवहार है। जहां मुफ्त मिलता है, वहां आप ही बिकाऊ माल या सेवा हो। तरीके बदल गए, लेकिन धंधा बदस्तूर जारी है। ईमेल, सोशल मीडिया, ऑनलाइन स्टोरेज़ और न जाने कितने ऐप्प। सब मुफ्त। कैश में कोई अदायगी नहीं। लेकिन वे आपकी ही नहीं, आपके दोस्तों तक की सारी जानकारी खींच लेते हैं ताकि आपको बेचा जा सके, मनमाफिक दुहा जा सके। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

निफ्टी इस साल 29 जनवरी के ऐतिहासिक शिखर 11,171.55 से 16 मार्च के सबसे निचले स्तर 9951.90 तक 10.92% गिर चुका है। उस दिन एनएसई में 312 कंपनियों ने 52 हफ्तों की तलहटी पकड़ ली। इनमें स्टेट बैंक, अंबुजा सीमेंट्स, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, अडानी पावर, कैडिला, ल्यूपिन, पीएफसी, सीमेंस व टाटा मोटर्स जैसी कई नामी कंपनियां शामिल हैं। लेकिन 52 हफ्तों का न्यूनतम स्तर ही सुरक्षित निवेश का पैमाना नहीं है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…और भीऔर भी