सूचकांक भले ही नई ऊंचाइयां छूते जा रहे हों। लेकिन पूरे शेयर बाज़ार में जहां हर दिन कुछ शेयर 52 हफ्ते का उच्चतम स्तर बना लेते हैं, वहीं कुछ शेयर न्यूनतम स्तर पकड़ लेते हैं। मसलन, बीते शुक्रवार को एनएसई में जहां 92 शेयर शिखर पर पहुंच गए, वहीं 40 शेयर साल भर के न्यूनतम स्तर तक जा गिरे। हमें ट्रेडिंग करते हुए इन उठते-गिरते शेयरों पर बारीक नज़र रखनी चाहिए। अब परखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

दूध उबलता है दस मिनट तो उफनता है बमुश्किल 10-15 सेकंड। फिर पानी के छींटे मारने या लौ से हटा लेने पर सम जाता है। इसी तरह मानकर चलें कि हमारे शेयर बाज़ार का मौजूदा उफान ज्यादा लंबा नहीं खिंचेगा। अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने सिस्टम में डाले गए अतिरिक्त नोटों को खींचने का फैसला कर लिया है, ब्याज दर भी बढ़ा दी है। तथास्तु में आज एक अच्छी कंपनी जिसके शेयर में ज्यादा उफान नहीं आया है।औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार के आगे अमेरिका या ब्रिटेन की राजनीतिक अनिश्चितता के साथ-साथ घरेलू अस्थिरता का भी रिस्क आ खड़ा हुआ है। आर्थिक रिस्क पहले ही चौथी तिमाही में जीडीपी के कमज़ोर आंकड़ों के रूप में झलक दिखला चुका है। पहली जुलाई से देश भर में जीएसटी लागू होने जा रहा है। व्यापारी तबका इसको लेकर बहुत परेशान है। कहीं यह ‘आसान’ टैक्स महीनों तक सब कुछ जाम न कर दे। अब करते हैं शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

देश में हर महीने कम से कम 10 लाख नौजवान रोज़गार की लाइन में लग जाते हैं, यानी साल भर में करीब डेढ़ करोड़। नौजवानों की बढ़ती तादात को अर्थव्यवस्था के लिए वरदान माना जाता रहा है। लेकिन उन्हें काम-धंधे या नौकरियों में नहीं खपाया जा सका तो इस वरदान को अभिशाप बनते देर नहीं लगेगी। यह मोदी सरकार के लिए बेहद गंभीर चुनौती है। इसे जुबानी जमाखर्च से नहीं निपटा जा सकता। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

पिछले दिनों जिस तरह महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश के बाद देश के तमाम राज्यों में किसान आंदोलन भड़क गया, उसे देखते हुए फिलहाल राजनीतिक रिस्क बहुत ज्यादा बढ़ गया लगता है। मालूम हो कि खेती-किसानी ने शिव की जटा की तरह असंतोष की उफनती गंगा को समेटकर रखा हुआ है। करोड़ों बेरोज़गार गांवों में खेती से जबरन चिपके हुए हैं। अगर एक बार वे वहां से छिटके तो उन्हें संभालना मुश्किल हो जाएगा। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी