विषम दुष्चक्र है मन व सहजबोध का
2016-09-29
दिमाग को जैसा पढ़ा दो, वो तोता-रटंत कर लेता है। लेकिन मन को सिखाने में बड़ी मशक्कत व वक्त लगता है। बचपन व परिवेश से मिली वृत्तियां सहजबोध या कॉमन-सेंस बनकर वहां जमी रहती हैं जो हमारे विचारों से लेकर भावनाओं तक को नियंत्रित करती हैं। फिर उन्हीं के हिसाब से शरीर की तमाम ग्रंथियां हार्मोन्स का स्राव करती हैं और हम कभी उनके विषम दुष्चक्र से निकल ही नहीं पाते। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

