ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती। इसी तरह शायद इंट्रा-डे ट्रेडरों की बरक्कत नहीं होती। बेचारे सुबह से शाम तक मेहनत करते हैं। लेकिन बमुश्किल इतनी दिहाड़ी कमा पाते हैं कि किसी तरह चाय-पानी और आने-जाने का खर्चा निकल जाए। शेयर बाज़ार में कमाते हैं वही जो कई दिनों, महीनों या सालों के सौदे करते हैं। इसमें भी वे जो भावी आकलन में ज्यादा माहिर होते हैं। इस महारत का क्या है सूत्र? फिलहाल सोमवार का व्योम…औरऔर भी