वित्तीय बाज़ार में रोज़-ब-रोज़ के भाव खबरों से प्रभावित होते हैं। लेकिन अगर हम दिन बढ़ाते जाएं तो तात्कालिक खबरों का असर कम हो जाता है। इसी रिस्क को कम करने के लिए हम स्विंग, मोमेंटम या पोजिशन ट्रेड का सहारा लेते हैं। बहुत से प्रोफेशनल ट्रेडर तो जिस दिन खबर रहती है, ट्रेड ही नहीं करते। कुछ तो साल में 20-25 दिन ही ट्रेड करके अपना निर्धारित लक्ष्य हासिल कर लेते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार बंद होने के बाद आंकड़े आए कि अप्रैल में रिटेल मुद्रास्फीति चार महीनों के न्यूनतम स्तर 4.7% पर आ गई। लेकिन मार्च में देश का औद्योगिक उत्पादन बढ़ने की रफ्तार सुस्त पड़कर 2.1% हो गई। कल के बारे में कहा जा रहा है कि चूंकि भूमि अधिग्रहण और जीएसटी जैसे विधेयक फिलहाल टल गए हैं, इसलिए बाज़ार इतना ज्यादा गिर गया। फिर, बाहर से ग्रीस का संकट भी मंडरा रहा है। अब चलाएं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

खरीदारी ज्यादा तो बाज़ार बढ़ता है और बिकवाली ज्यादा तो बाज़ार गिरता है। खरीदारी, बिकवाली का ज्यादा होना बाज़ार में सक्रिय निवेशकों या ट्रेडरों, खासकर संस्थाओं के भावी आकलन व रुख से तय होता है। बाज़ार लगातार दूसरे दिन बढ़ गया तो दूर की कौड़ी फेंकी जाने लगी कि चूंकि चीन ने ब्याज दर घटा दी है, इसलिए रिजर्व बैंक 2 जून को अगली मौद्रिक नीति समीक्षा में ब्याज दर घटा सकता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बराबर तनाव से दूर रहे। भावनाओं पर अंकुश रखा। किसी के कहने में नहीं आए। खुद सारी गणना की, हिसाब-किताब लगाया। फिर भी सौदा जैसा सोचा था, उसकी उल्टी दिशा में चला गया। ऐसा होने पर अपनी किस्मत को दोष मत दीजिए क्योंकि हर किसी के साथ यही सब होता है। बाज़ार या भविष्य कभी किसी के इशारों पर नहीं चलता। इसीलिए यहां रिस्क को संभालने की रणनीति अपनाई जाती है। अब देखते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

बराबर रिटर्न कमाते-कमाते अक्सर भ्रम हो जाता है कि शेयर बाज़ार में रिस्क ही नहीं। अगर है तो हम उस्ताद जो ठहरे! इस भ्रम को तोड़ दिया बीते हफ्ते बुधवार ने, जब सेंसेक्स 2.63% और निफ्टी 2.74% लुढ़क गया, वो भी सिंगापुर में हुई अल्गोरिदम ट्रेडिंग के चलते। याद रखें कि ग्लोबल हो जाने से शेयर बाज़ार में निवेश/ट्रेडिंग का रिस्क घटने के बजाय बढ़ गया है। आज तथास्तु में ऐसी कंपनी जिसमें रिस्क थोड़ा ज्यादा है…औरऔर भी