बाज़ार और लोकतंत्र आपस में अभिन्न रूप से संबद्ध हैं। यहां विचारों और धारणा में भिन्नता ज़रूरी है। सोचिए, अगर सारे लोग किसी स्टॉक के भाव को लेकर मान बैठें कि उसे बढ़ना है तो कौन मूर्ख होगा जो उसे बेचेगा। बेचता वही है जो मानता है कि वह स्टॉक आगे जाकर गिरनेवाला है। लोगबाग एक-दूसरे से एकदम उल्टी सोच रखते हैं तभी खरीद-फरोख्त होती है और बाज़ार चलता है। आइए, अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी