जो तर्क से चलता है, उसे आप दाएं-बाएं करके पकड़ सकते हैं। पर जो भावना से चलता है, उसे तर्क से पकड़ना बेहद मुश्किल है। और, शेयर बाज़ार तर्क से कम और भावना से ज्यादा चलता है। कल हमने अभ्यास के लिए तीन स्टॉक्स डीएलएफ, मारुति और रिलायंस इंडस्ट्रीज़ पेश किए। तर्क कहता था कि डीएलएफ जैसा कमज़ोर स्टॉक तो अब मुनाफावसूली का शिकार हो ही जाएगा। लेकिन वो तो 7.83% चढ़ गया। अब वार मंगल का…औरऔर भी

2004 के लोकसभा नतीजों के बाद बाज़ार 17% गिरा। 2009 के नतीजों के बाद 17% बढ़ा। वहीं 2014 के बम्पर नतीजों के बावजूद निफ्टी केवल 1.12% बढ़ा। हालांकि पिछले तीन महीनों में करीब 20% पहले ही बढ़ चुका था। लेकिन अभी सब कुछ शांत भाव से हो रहा है। पहले जैसी हड़बोंग नहीं। मोदी सरकार अगले तीन महीनों में क्या फैसले करती है, इसी से बाज़ार का भरोसा टिकेगा या टूटेगा। अब बदले ज़माने का पहला वार…औरऔर भी

उत्साह का आलम। नई शुरुआत। बाज़ार को मनमांगी मुराद मिल गई तो सेंसेक्स व निफ्टी नई ऐतिहासिक ऊंचाई पर। ऐसे में निवेश तो बनता है। पर सबसे बड़ी चुनौती है कि किस शेयर में? इसे सुलझाने के लिए जितना बड़ा रिसर्च सेटअप चाहिए, उसमें हर महीने पांच-दस लाख डालने होंगे। फिर भी हम यहां-वहां से जुगाड़ कर 200 रुपए/माह में चार शेयर बता रहे हैं। उठाएं इस सस्ती व भरोसेमंद सेवा का लाभ। अब आज की कंपनी…औरऔर भी

तैयारी हर तरफ है। वित्त मंत्रालय सेबी व रिजर्व बैंक समेत शीर्ष वित्तीय नियामकों की बैठक कर चुका है। शेयर बाज़ार व बांड बाज़ार को संभालने की खास तैयारियां हैं। बैकों को खासतौर पर हिदायत दी गई है कि बड़ी लांग पोजिशन लेने से बचें। अनिश्चितता के बीच आशंका! कहीं 17 मई 2004 या 16 मई 2009 जैसा हाल न हो जाए जब बाज़ार ने जबरदस्त तूफान मचाया था। इस बार क्या रहेगा उपयुक्त, देखते हैं आगे…औरऔर भी

कंपनियों के विज्ञापन और नेताओं के बयान में ज्यादा फर्क नहीं होता। एक नेताजी बोले कि देश में अच्छे दिन आ गए। इसका सबूत है कि शेयर बाज़ार इतना चढ़ गया। लेकिन बाज़ार तो इसलिए बढ़ा है क्योंकि विदेशियों ने झटपट मुनाफा कमाने के लिए शुक्र से लेकर अब तक इसमें 6033.04 करोड़ डाले हैं, जबकि देशी संस्थाओं ने 1042.17 करोड़ निकाले हैं। विदेशी कमाएं, देशी लुटाएं तो अच्छे दिन कैसे? खैर, हम चलें गुरु की डगर…औरऔर भी