पहले तय करें कि निकलना कहां है, फिर बाज़ार को देखें। जैसे ही निकलने का सबसे अच्छा भाव मिले, फौरन पोजिशन काट दें। यह है शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग करते वक्त प्रोफेशनल ट्रेडरों की आम रणनीति। यह कठिन-कठोर अनुभव और लौह अनुशासन की सीख है। वहीं नए ट्रेडर बाज़ार को वैसे देखते हैं जैसे कोई चूहा सामने आए सांप को देखता है। उसके हाथ-पैर फूल जाते हैं और वो सांप का निवाला बन जाता है। अब आगे…औरऔर भी

शेयर बाज़ार ही नहीं, किसी भी बाज़ार में भाव तभी बदलते हैं जब डिमांड और सप्लाई का संतुलन टूटता है। इस तरह बनते असंतुलन को प्रोफेशनल ट्रेडर पहले ही भांप लेते हैं। वे चार्ट पर देख लेते हैं कि कहां एफआईआई, बीमा कंपनियां, म्यूचुअल फंड और बैंक जैसे बड़े संस्थागत निवेशक खरीद-बेच रहे हैं। प्रोफेशनल ट्रेडर यह भी जानते हैं कि सामने भावनाओं व अहंकार में डूबा एक शेखचिल्ली ट्रेडर बैठा है। हमें प्रोफेशनल ट्रेडर बनना है…औरऔर भी

सी-सॉ का खेल। तराजू के एक पलड़े पर डॉलर तो दूसरे पर रुपया। दो साल पहले जुलाई 2011 में डॉलर को बराबर करने के लिए पलड़े पर 44.32 रुपए रखने पड़ते थे। अब 61.22 रुपए रखने पड़ रहे हैं। इस तरह रुपया डॉलर के मुकाबले दो साल में 38.13 फीसदी हल्का हो चुका है। इस दौरान डॉलर खुद अपने देश में मुद्रास्फीति (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित) के कारण जुलाई 2012 तक 1.7 फीसदी और उसके बादऔरऔर भी

रुपया डॉलर के मुकाबले इस साल 9.27% गिर चुका है। सोमवार को 61.21 की ऐतिहासिक तलहटी छूने के बाद 60.62 पर बंद हुआ। हर तरफ हाहाकार है कि रसातल में जाता रुपया अब संभाला नहीं जा सकता और वो अपने साथ अर्थव्यवस्था और शेयर बाज़ार को भी डुबा देगा। पर सच यह है कि उसकी कमज़ोरी ही एक दिन मजबूती का सबब बनेगी। आयात घटेंगे, निर्यात बढ़ेंगे, रुपया सबल होगा। इस चक्र को समझते, बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

मैं गलत कैसे हो सकता हूं? एक-न-एक दिन साबित हो जाएगा कि मैंने जो फैसला लिया, वो कितना सही था। कुछ ऐसा ही सोचकर हम पुराने फैसलों से चिपके रहते हैं और अपने सही होने का इंतज़ार करते हैं। वक्त सरकता जाता है, पर हमें सही साबित करने का वक्त कभी नहीं आता। जीवन में यह सोच भले चल जाए, लेकिन शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से चिपक जाए तो बरबाद कर डालती है। अब आज का अध्याय…औरऔर भी