इस समय दुनिया में जिन देशों की प्रति व्यक्ति आय 13,205 डॉलर से ज्यादा है, उन्हें विश्व बैंक ने उच्च आय या विकसित देशों की श्रेणी में रखा है। अपने रिजर्व बैंक के एक अध्ययन के मुताबिक आनेवाले दशकों में मुद्रास्फीति के असर को शामिल कर लिया जाए तो 2047 में उन्हें ही विकसित देश माना जाएगा जिनकी प्रति व्यक्ति आय 21,664 डॉलर होगी। यह लक्ष्य हासिल करने के लिए डॉलर में भारत की प्रति व्यक्ति आयऔरऔर भी

तीन-चार साल में भारत का दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाना तय है। लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा भारत को 2047 तक विकसित देश बना देने का वादा खुद-ब-खुद नहीं पूरा होने जा रहा। ऐसा इसलिए क्योंकि इसका वास्ता जीडीपी के आकार से नहीं, बल्कि प्रति व्यक्ति आय से है जिसमें भारत इस समय 2256.59 डॉलर के साथ दुनिया के 190 देशों की सूची में 146वें स्थान पर है। 189वें नंबर पर अफगानिस्तान और 190वें पर बुरुंडीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार आज के यथार्थ पर नहीं, बल्कि कल के ख्वाब पर चलता है। हालांकि ये ख्वाब भी हवा-हवाई नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत से निकले अनुमानों पर टिके होते हैं। अर्थव्यवस्था और कंपनियों की संभावित मजबूती ही अंततः शेयर बाज़ार की तेज़ी का आधार होती है। लेकिन अर्थव्यवस्था को अगर सब्ज़बाग पर चुनावी उड़ान भरने का साधन बना दिया जाए तो मामला बड़ा संगीन हो जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था को कायदे से 8-9% की सालाना दर सेऔरऔर भी

वाणिज्य मंत्रालय से जुडे व्यापार उपचार महानिदेशालय (डीजीटीआर) ने सिफारिश की थी कि चीन से आयात हो रहे स्टील उत्पादों पर पांच सालों के लिए 18.95% काउंटरवेलिंग ड्यूटी (सीवीडी) लगा दी जाए ताकि घरेलू स्टील उद्योग को बचाया जा सके। लेकिन वित्त मंत्रालय ने इनकार कर दिया। उसका कहना है कि इससे भले ही देशी स्टील निर्माताओं को नुकसान हो, लेकिन स्टील उपभोक्ता भारतीय फर्मों को फायदा होगा। सवाल उठता है कि जब सारी दुनिया के देशऔरऔर भी

यूपीआई का हल्ला। प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री की वाह-वाही थम नहीं नहीं रहे। लेकिन यूपीआई में सबसे ज्यादा धंधा पेटीएम और गूगल-पे कर रहे हैं। पेटीएम स्वामित्व के लिहाज से अब चीनी कंपनी है, जबकि गूगल-पे पूरी तरह अमेरिकी है। क्रेडिट व डेबिट कार्ड के लिए स्वदेशी रूपे को लॉन्च किए हुए 11 साल हो चुके हैं। लेकिन अब भी अधिकांश कार्ड वीसा या मास्टरकार्ड हैं जो अमेरिकी कंपनियां हैं जिनके पास भारतीय उपभोक्ताओं की खरीद सेऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था और उत्पादन के चार बुनियादी कारक हैं – ज़मीन, श्रम, पूंजी और उद्यमशीलता। उद्यमशीलता की अपने यहां कोई कमी नहीं है। अर्थव्यवस्था का अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्र इसकी गवाही देता है, जहां देश का 94% से ज्यादा रोज़गार मिला हुआ है। नोटबंदी से पहले अर्थव्यवस्था में इसका योगदान 55-60% हुआ करता है जो जीएसटी जैसे कदमों से घटकर अब 15-20% रह गया है। लेकिन ज़मीन, श्रम व पूंजी की स्थिति दयनीय बनी हुई है। सब कुछऔरऔर भी

आज़ादी का अमृतकाल। आज़ादी के 76 साल पूरे। लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार दसवीं बार देश को संबोधन। सरकार के पास संसद में बहुमत इतना कि जो चाहे कर सकती है। समूचे देश में वही पूरी तरह आज़ाद है। दस दिन पहले ही अचानक उसने फरमान जारी कर दिया कि देश में पीसी से लेकर लैपटॉप, पामटॉप, ऑटोमेटिक डेटा प्रोसेसिंग मशीन और माइक्रो व लार्जफ्रेम कंप्यूटर तक के आयात के लिए लाइसेंस लेनाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग उनके लिए खबरों और फंडामेंटल्स का खेल हो सकता है जिनके पास खबरें और कंपनी के नतीजे औरों से पहले पहुंच जाते हैं। ऐसी पहुंच वालों तक पहुंचना रिटेल ट्रेडर के लिए नामुमकिन है। उसके लिए तो शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग शुद्ध रूप से मनोविज्ञान का खेल है। इसमें भी उसे अपने साथ ही दूसरों की लालच और भय की भावनाओं के काम करने के तरीकों की तह में पहुंचना होता है। जोऔरऔर भी

शेयर बाज़ार अगर आपके निजी व पारिवारिक जीवन को अशांत बना दे रहा है तो फौरन इसे छोड़ देना चाहिए। ट्रेडिंग कर रहे हैं तो इससे हो रही कमाई से बीच-बीच में छुट्टी मनाते और आनंद लेते रहें। अच्छा फायदा कमा लिया तो उसका एक अंश अकेले अपने पर नहीं, बल्कि परिवार के साथ खुशी मनाने पर खर्च करें। उनका साथ व सहयोग आपके ट्रेडिंग के बिजनेस के लिए बहुत ज़रूरी है। परिवार के जिस भी सदस्यऔरऔर भी

बर्तन में पानी रख उस पर सोडियम को टुकड़ा डाल दें तो वह इस कोने से उस कोने तक छनाक-छनाक भागता रहता है। अंत में खत्म हो जाता है। शेयर बाज़ार के बहुत सारे ट्रेडर भी हमेशा इसी तरह बेचैन रहते हैं। इधर से उधर छनाक-छनाक करते रहते हैं। हमेशा तलाश में रहते हैं कि कहीं से कोई टिप्स मिल जाएं। अंत में ऐसे ट्रेडर भी खत्म हो जाते हैं। जो शांत है, वही शेयर बाज़ार मेंऔरऔर भी