जब नीयत गलत हो, मंशा में खोट हो तो बड़ी-बड़ी बातों व दावों का कोई मतलब नहीं रह जाता। नौ साल से केंद्र की सत्ता में विराजमान और अगले पांच साल तक सत्ता पाने का यकीन रखनेवाली मोदी सरकार को किसी दूसरे पर यकीन नहीं। वह अपनी सत्ता में बनाए रखने की कुव्वत रखनेवाले चंद लोगों की ही सुनती है और उन पर कोई आंच न आए, इसी की गारंटी देती है। इसके लिए उसने जांच एजेंसियोंऔरऔर भी

भारत को 2047 तक विकसित देश बनना है तो हमारी अर्थव्यवस्था को अगले 24 साल तक 9.41% की सालाना चक्रवद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ना होगा। हमारा जीडीपी 2019 से 2023 तक औसतन 4% सालाना की दर से बढ़ा है। अभी उसकी दर 6-7% की रेंज में है। सब इसी में मगन हैं कि हम दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। किसी के पास कोई रोडमैप नहीं कि 2047 तक कैसे 9% की सीएजीआरऔरऔर भी

आज की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि मोदी सरकार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो अर्थव्यवस्था को भलीभांति समझता हो। सब कुछ नौकरशाहों और जी-हुजूरी करनेवालों के हवाले है। पीएमओ प्रधानमंत्री की सोच व कर्म का ही एक्सटेंशन है। जो भी मोदी की नहीं मानता, उसे जाना पड़ता है चाहे वो रिजर्व बैंक गवर्नर ऊर्जित पटेल हों या मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन। ऐसे में अर्थव्यवस्था ऑटो-पायलट मोड में है या कहें तो राम-भरोसेऔरऔर भी

तेरह साल गुजरात के मुख्यमंत्री और नौ साल से देश के प्रधानमंत्री रहे नरेंद्र दामोदर दास मोदी की हरेक हरकत, सारी कथनी-करनी, बोली-वाणी, सारा कुछ हाइप पर टिका है। शेयर बाज़ार भी मूलतः हाइप पर चलता है। इसलिए इन दोनों का मेल बड़ा घातक और खतरनाक है। राजनीति का तो पता नहीं, लेकिन शेयर बाज़ार का हाइप पर टिका हर बुलबुला एक न एक दिन फूटता ही है। और, वो दिन रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों के लिएऔरऔर भी

लक्ष्य था कि 2025 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बना देंगे। लेकिन यह लक्ष्य 2025 तो छोड़िए 2026 तक भी हासिल करना असंभव है तो 2047 में भारत को विकसित देश बना देने का सपना उछाल दिया। लेकिन ‘कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक’ तो मोदी सरकार ने 24 साल बाद के सपने को 2024 के चुनावों का अभियान बनाकर अभी से विकसित भारत संकल्प यात्रा निकाल दी। 2047 में नऔरऔर भी

जिस नई औद्योगिक नीति पर दो साल से ज्यादा वक्त से काम चल रहा था, जिसका ड्राफ्ट साल भर पहले दिसंबर में ‘मेक इन इंडिया फॉर द वर्ल्ड’ के नाम से जारी किया गया था, जिसे लाइसेंस-परमिट राज को खत्म के लिए 1991 में लाई गई ऐतिहासिक औद्योगिक नीति की जगह लेनी थी, उसे अब सरकार ने अनिश्चितकाल के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया है। उसने इसकी जगह प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव (पीएलआई) स्कीम से काम चलानेऔरऔर भी

भारत की सबसे बड़ी ताकत है इसकी युवा पीढ़ी, जिसे डेमोग्राफिक डिविडेंड कहा जाता है। लेकिन भारत अभी भुखमरी के सूचकांक में दुनिया के 125 देशों में 111वे स्थान पर है। हमारे पांच साल तक के 35% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। 2047 में जब अमृतकाल पूरा होगा, तब ये बच्चे 24 से 29 साल के शारीरिक व मानसिक रूप से कमज़ोर युवा होंगे। ऐसी स्थिति में 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने का दावा क्रूरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के धुरंधर मानकर चल रहे हैं कि भारत मूलभूत रूप से बदल गया है। हम सरपट विकास की राह पर हैं। सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर डिफेंस तक पर खुलकर खर्च कर रही है जिससे हमारी कंपनियों को फायदा हो रहा है। सब कुछ मोदीमय है। चूंकि 2024 में भी मोदी सरकार बनना तय है तो बाजार कुलांचे मारे जा रहा है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि संसद बेमानी हो गई है, हाईकोर्टऔरऔर भी

भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन प्रति व्यक्ति जीडीपी में दुनिया के 194 देशों में 144वें नंबर पर है। यह कैसा विकास है जिसमें निर्जीव आंकड़े है, लेकिन सजीव इंसान और उसके बाल-गोपाल गायब हैं? संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन (एफएओ) की एक रिपोर्ट कहती है कि 74.1% भारतीय स्वस्थ आहार जुटा पाने में असमर्थ हैं। विकास को मृत आंकड़ों से नहीं, जीवन के स्तर से नापा जाना चाहिए। हाथ में मोबाइलऔरऔर भी

आकांक्षा से भरे भारत के लिए 1947 तक देश को विकसित बनाने का सपना और मतपत्रों से सत्ता में बैठने का लाइसेंस पाने के लिए 81.35 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन। जिसे भी कोई गुरेज हो तो उसे सब्सिडी देकर चुप करा दो। वित्त वर्ष 2013-14 में सरकार ने खाद्य, खाद व ईंधन पर कुल 2,44,717 करोड़ रुपए की सब्सिडी दी थी। उसके बाद अच्छे दिन का नारा लेकर सत्ता में आई मोदी सरकार के शासन मेंऔरऔर भी