सूचकांकों के पैमाने पर देखें तो हमारा शेयर बाज़ार फिर ऐतिहासिक ऊंचाई पर है। सेंसेक्स दिसंबर 2007 और नवंबर 2010 में कमोबेश इन्हीं स्तरों पर था। इसका मतलब यह हुआ कि दिसंबर 2007 में जिसने सेंसेक्स में पैसे लगाए होंगे, आज करीब छह साल बाद उसका रिटर्न शून्य है। 10% मुद्रास्फीति के असर को जोड़ दें तो उसके 100 रुपए आज असल में घटकर 56.45 रुपए रह गए हैं। निवेशक दुखी, ट्रेडर खुश। अब आगाज़ आज का…औरऔर भी

दस में से नौ लोग सोचते/मानते हैं कि शेयर बाज़ार फटाफट धन कमाने का ज़रिया है। कमाई से ऊपर की कमाई! जिस भाव पर खरीदा, दूसरे ने उससे ज्यादा भाव पर खरीद लिया और नोट बनते चले गए। जबकि सोचना चाहिए कि हम ऐसी कंपनी को पूंजी दे रहे हैं, जो उस पर एफडी से ज्यादा कमाएगी। ध्यान रखें, स्टॉक्स दौलत बनाने का माध्यम हैं, बचत या आमदनी के नहीं। आज तथास्तु में एक मजबूत स्मॉल-कैप कंपनी…औरऔर भी

देश पर लगता है कि डेरिवेटिव ट्रेडिंग का जुनून सवार है। आपको यकीन नहीं आएगा कि वित्त वर्ष 2001-02 से 2012-13 के बीच के ग्यारह सालों में इक्विटी फ्यूचर्स व ऑप्शंस (एफ एंड ओ) में रोज़ का औसत टर्नओवर 71.18 फीसदी की सालाना चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ता हुआ 420 करोड़ से 1,55,048 करोड़ रुपए पर पहुंच चुका है। अभी कल, 18 अक्टूबर 2013 को एनएसई के एफ एंड ओ सेगमेंट का टर्नओवर 1,67,558 करोड़ रुपए रहाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में हमारा हर कदम हमारे व्यक्तित्व की झलक दिखाता है। सो, यह हमारी अपनी ज़िम्मेदारी है कि सौदे करने के दौरान हम खुद को मन से खुश रखें। अगर तनाव में रहे, किसी वजह से परेशान रहे तो उसका सीधा असर हमारे फैसलों पर पड़ेगा जिससे हमारी ट्रेडिंग प्रभावित हो सकती है। यहां तो मामला वही है कि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। इसलिए मस्त रहे, तभी कमा सकते हैं। अब रुख शुक्र के बाज़ार का…औरऔर भी

दुनिया के सबसे प्रसिद्ध निवेश वॉरेन बफेट ने कल ही अमेरिका में ऋण सीमा पर मची जिस तनातनी को जनसंहार का राजनीतिक हथियार कहा था, उसका संकट अब टल चुका है। अमेरिकी नेता सारी दुनिया को संकट में डालने का जोखिम उठा भी नहीं सकते थे। इसलिए संसद के दोनों सदनों सीनेट व प्रतिनिधि सभा ने ऋण सीमा को बढ़ाने का प्रस्ताव पास कर दिया। राष्ट्रपति ओबामा ने इस पर मोहर भी लगा दी है। अब आगे…औरऔर भी

शनिवार को एक शख्स से मिला जिनका अंदाज़ देखकर दिल गदगद हो गया। साथ गए सज्जन के मुंह से जैसे ही ‘टिप’ शब्द निकला, भाई पलटकर बोला, “टिप वेटर लेते हैं और मैं कोई वेटर नहीं हूं।” वाकई वेटर की मानसिकता से ट्रेडिंग में कामयाबी नहीं मिल सकती। किसी भी सलाह को जब तक आप अपने सिस्टम पर अलग-अलग टाइमफ्रेम में परख नहीं लेते, तब तक उस पर ट्रेडिंग करना गलत है। अब परखें मंगल की दशा-दिशा…औरऔर भी

जिस तरह हमारे शरीर की सीमाएं हैं, उसी तरह हमारे दिमाग की भी सीमाएं हैं। मानव मस्तिष्क को पांच से ज्यादा वेरिएबल्स दे दो तो वह फ्रीज़ हो जाता है, कन्फ्यूज़ होकर काम ही करना बंद कर देता है। इसलिए बाज़ार का विश्लेषण करते वक्त पांच से ज्यादा संकेतकों या अलग डाटा का इस्तेमाल हमें भ्रमित कर सकता है। हमें चार्ट से बाज़ार में सक्रिय लोगों की सक्रियता समझनी है। अब करते हैं आगाज़ इस हफ्ते का…औरऔर भी

अगर आप बूढ़े व अशक्त नहीं हैं और पहाड़ चढ़ रहे हों तो बड़ा छोड़कर छोटा रास्ता अपनाते हैं, भले ही वहां पैर फिसलने का जोखिम हो। दरअसल, मानव मस्तिष्क के तार जुड़े ही ऐसे हैं कि हम स्वभावतः शॉर्टकट को तरजीह देते हैं। लेकिन लंबे निवेश में शॉर्टकट की मानसिकता बेहद नुकसानदेह साबित होती है। इसलिए हमें संयम और अनुशासन से खुद को शॉर्टकट की तरफ जाने से रोकना पड़ता है। अब आज की चुनिंदा कंपनी…औरऔर भी

एक ट्रक डाइवर था। मस्त-मस्त सपने बुनता था कि थोड़ा-थोड़ा करके किसी दिन इतना बचा लेगा कि अपना ट्रक खरीदेगा और तब गैर का चाकर नहीं, खुद अपना मालिक होगा। सौभाग्य से एक दिन वो सपना पूरा हुआ। सालों-साल की बचत काम आई। उसने एकदम झकास नया ट्रक खरीदा। नौकरी छोड़ दी। यार-दोस्तों के साथ खुशी मनाने के लिए जमकर दारू पी। उसी रात घर लौट रहा तो नशे में ट्रक खड्डे में गिरा दी। डीजल टैंकऔरऔर भी

गिरता स्टॉक थोड़ा उठ जाए तो क्या! बढ़ता स्टॉक थोड़ा गिर जाए तो क्या!! नियम कहता है कि साल-छह महीने से बढ़ते शेयर को शॉर्ट न करें और साल-छह महीने से गिरते शेयर में लांग पोजिशन न पकड़ें। ऐसा नहीं कि गिरते शेयर थोड़े दिन बढ़ नहीं सकते या बढ़ते शेयर कुछ दिन गिर नहीं सकते। लेकिन अपट्रेंडिंग स्टॉक्स में लांग और डाउनट्रेंडिंग स्टॉक्स में शॉर्ट करना ट्रेडिंग में रिस्क को घटाने की रणनीति है। अब आगे…औरऔर भी