काटते क्यों खुद बरबादी का परवाना!

एक ट्रक डाइवर था। मस्त-मस्त सपने बुनता था कि थोड़ा-थोड़ा करके किसी दिन इतना बचा लेगा कि अपना ट्रक खरीदेगा और तब गैर का चाकर नहीं, खुद अपना मालिक होगा। सौभाग्य से एक दिन वो सपना पूरा हुआ। सालों-साल की बचत काम आई। उसने एकदम झकास नया ट्रक खरीदा। नौकरी छोड़ दी। यार-दोस्तों के साथ खुशी मनाने के लिए जमकर दारू पी। उसी रात घर लौट रहा तो नशे में ट्रक खड्डे में गिरा दी। डीजल टैंक ने आग पकड़ ली। ट्रक के साथ सारी बचत स्वाहा हो गई। तब तक ट्रक का बीमा भी नहीं कराया था तो कहीं से कुछ नहीं मिला। पलटकर फिर मालिक के पास पहुंचा और वही पुरानी ड्राइवरी करने लगा।

बैंक का सीनियर मैनेजर। ट्रेजरी का काम देखता था। अच्छी-खासी तनख्वाह। ठीकठाक खर्च करने के बावजूद पंद्रह साल की नौकरी में मुंबई में अपना घर खरीद लिया। ऊपर से करीब तीस लाख की बचत। एक दिन मन में आया कि क्यों न नौकरी छोड़कर खुद ट्रेडिंग का धंधा किया जाए! बीवी ने मना किया। कहने लगी: बदले-बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं, घर की बरबादी के आसार नज़र आते हैं। लेकिन बंदे ने छोड़ दी नौकरी। ट्रेडिंग शुरू। लेकिन यह क्या! घाटे पर घाटा। सोचा – मैं तो वहां कामयाब था। यहां कैसे फेल हो सकता हूं। फिर, टेक्निकल एनालिसिस का कोर्स किया। तमाम इंडीकेटरों को मिलाकर ट्रेडिंग करने लगा। कैश सेगमेंट ही नहीं, फ्यूचर्स व ऑप्शंस में भी। लेकिन जितना लाभ, उससे कई गुना घाटा। पूंजी घटकर तीन लाख रह गई। धीरे-धीरे ट्रेडिंग अब शौक से नशा बन चुकी है। घर गिरवी रखकर पूंजी जुटाने की जुगत में है। ब्रोकर के यहां पूरे दिन बैठकर ट्रेडिंग के दांव आजमाता है। हाथ कमोडिटी ट्रेडिंग की तरफ भी बढ़ने लगे हैं। मतलब बरबादी का इंतज़ाम पक्का।

ट्रक ड्राइवर को तो वापस नौकरी मिल गई। लेकिन मैनेजर साहब को छोड़ी गई नौकरी मिलने के आसार नहीं हैं। भाई करे तो क्या करे? बीवी बच्चे भी आंख दिखाने लगे हैं। कैसी ट्रेजडी है नीच! आखिर ऐसा क्यों होता है कि अच्छे-खासे बुद्धिमान लोग, जो छात्र जीवन से लेकर प्रोफेशनल करिअर में हमेशा कामयाब होते रहे हैं, लगातार मुंह की खाने लगते हैं? वजह क्या है? अज्ञान, बदकिस्मती या नाकाम होने की छिपी हुई हसरत! यह कैसी हरसत है, कैसा इश्क है? इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के!!

असल में बुहत से लोगों में खुद को ही नुकसान पहुंचाने की फितरत होती है। इसके पीछे है मानव स्वभाव की आक्रामकता। लेकिन बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि सभ्य बनो, बड़ों का आदर करो, छोटो से प्यार करो, आदि-इत्यादि। अब उस आक्रामकता को कहीं तो निकलना है तो वह अपने ऊपर ही टूट पड़ती है। हम अपने गुस्से को अपनी ही तरफ मोड़ देते हैं। बहुत सारे लोग जो डरे हुए रहते हैं, शर्मीले होते हैं, उसकी वजह कहीं न कहीं यह है कि उनकी स्वभावगत आक्रामकता बाहर न निकल पाने पर सबसे कमज़ोर शिकार, यानी खुद अपने ऊपर ही झपट पड़ती है।

समाज में ऐसे आत्मघात के बहुत सारे बचाव हैं। अभी हाल तक तो आत्महत्या को कानूनन अपराध माना गया था। ऐसे लोगों की मदद के लिए बहुत सारे एनजीओ और हेल्पलाइन हैं। लेकिन कोई ट्रेडर अपनी ही बरबादी पर तुल जाए तो उसे बचाने की कोई व्यवस्था नहीं है। भारत ही नहीं, सारी दुनिया का यही हाल है। वह वित्तीय बाज़ार में यहां से वहां भागता है, भटकता है। ब्रोकर और दूसरे ट्रेडर उसकी पूंजी सोखते चले जाते हैं। एक दिन वो कंगाल होकर विकट दारूबाज़ जैसी गति को प्राप्त होता है।

इससे बचने के लिए अच्छा है कि हम शुरू में टेस्ट कर लें कि हमने ट्रेडिंग में कहीं आत्मघाती राह तो नहीं पकड़ ली है। इसे परखने का एकमात्र तरीका है कि हम लिखित रिकॉर्ड रखें कि हमने कहां-कब और क्यों ट्रेड किया, ट्रेड करते वक्त हमारी गणना क्या थी, असल में हुआ क्या, कितना नफा, कितना नुकसान और इस ट्रेड से हमें क्या सीखने को मिला। कितने इंडीकेटर काम आए, कितनों से दगा दी। जैसे ही आप यह सब नोट करने और देखने लगते हैं तो एक आत्मनिरीक्षण शुरू हो जाता है, जो आपको खुद-ब-खुद ठीक करने लगता है।

दूसरी बात ब्रोकर के कहने या किसी दूसरे की टिप पर कभी ट्रेड न करे। उसकी सलाह को जब तक अपने स्तर पर जांच न लें, तब तक उसमें हाथ, यानी पैसा न डालें। इस दुनिया में खुद और अपने परिवार के अलावा कोई किसी का सगा नहीं होता। सलाह देनेवाला तो हाथ छाड़कर खड़ा हो जाएगा। बोलेगा कि शेयर/कमोडिटी बाज़ार में रिस्क है, यह मैंने पहले ही कहा था। अब आपने हाथ जला डाला या पूरे जल गए तो मैं क्या कर सकता हूं।

तीसरी और सबसे अहम बात है धन प्रबंधन और अनुशासन। दो प्रतिशत और छह प्रतिशत का नियम मैं यहां पहले भी लिख चुका हूं। लेकिन उसे बार-बार अपने जेहन में बैठाने की जरूरत है। किसी भी एक ट्रेड में कुल पूंजी का दो फीसदी से ज्यादा नुकसान नहीं होना चाहिए। इसी हिसाब से हमें ट्रेड का साइज़ तय करना चाहिए। और, महीने में अगर कुल नुकसान छह फीसदी तक पहुंच गया तो ट्रेडिंग फौरन रोक देनी चाहिए। बाकी महीने किताब पढ़िए, कहीं घूमने चले जाइए। घर-परिवार पर समय दीजिए। बच्चे का होमवर्क कराइए। बीवी के साथ रसोई में हाथ बंटाइए।

कहने का मतलब कुछ भी कीजिए। लेकिन छह फीसदी पूंजी गंवा देने पर उस महीने दोबारा ट्रेडिंग की तरफ झांकिए भी मत। यह भी हो सकता है कि इस दौरान आप एक हफ्ते के विपश्चना/विपासना शिविर में चले जाएं। गोराई से लेकर, कल्याण, पुणे और इगतपुरी में नियमित रूप से ऐसे शिविर मुफ्त में चलते हैं। देश के दूसरे राज्यों में भी ऐसे केंद्र हैं। विपश्चना में आप किसी से बात तक नहीं कर सकते। आपको निरंतर अपने मन व तन की एक-एक हरकत को महसूस करना पड़ता है। बिना किसी के बताए आपको आत्मज्ञान होने लगता है। कोई दूसरा मीनमेख निकाले तो हमारे अहंकार को चोट लगती है। लेकिन वही बात खुद को दिख जाए तो हम उसे फौरन ठीक करने में जुट जाते हैं।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मुंबई में शेयर बाज़ार के तमाम धुरंधर बराबर विपश्चना साधना केंद्रों में जाकर शिविर करते हैं। इसमें दो खास नाम है अब एक्सिस बैंक का हिस्सा बन चुके एनाम सिक्यूरिटीज़ के प्रमुख वल्लभ भंसाली और आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल से एक्सिक बैंक में आए फंड मैनेजर निलेश शाह। हां, आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल भी बीच-बीच में विपश्चना साधना करते रहते हैं। सारी बातों की एक बात। अगर अगर बुद्ध नहीं बन सकते तो ट्रेडिंग में लंबे समय तक सफल नहीं हो पाएंगे। जब तक आपके मन की लगाम आपके दिमाग के हाथ में नहीं आती, तब तक भावना के घोड़े आपको घाटे की खाईं में गिराते रहेंगे। इसलिए हे पार्थ! भावनाओं से निकलकर विवेक और बुद्धि से काम ले। ऐसा मैं नहीं कह रहा, गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन ने कहा था। और क्या लिखूं। आप खुद समझदार हैं और समझदार को इशारा ही काफी!

2 Comments

  1. एक एक शब्द मोती है जिसे अपने दिमाग में सीपी की भाति सहेज कर रखना चाहिए……..दिल की अनंत गहराईयो से आप को बहुत बहुत बहुत धन्यवाद ।

  2. Really a nice most practical and realistic article. Thanks a lot.
    Best Wishes

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