हम न तेजड़िये हैं, न मंदड़िए। हम हैं विशुद्ध ट्रेडर। ज़रा-सा मौका देखकर चोला बदल लेते हैं। वैसे भी शाश्वत तेजड़िया या शाश्वत मंदड़िया जैसी कोई शख्सियत नहीं। यह बाज़ार का गढ़ा मिथ है। जिसको जहां जैसे मौका मिलता है, वैसे कमाता है। हमारी रणनीति होनी कि जो शेयर महंगे चल रहे हैं, उन्हें नीचे आने पर थोड़ा सस्ते में खरीदो और जो शेयर सस्ते चल रहे हैं, उन्हें उठने पर शॉर्ट करो। अब हाल-ए-बाज़ार आज का…औरऔर भी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीजेपी से पुराने गठबंधन के बारे में कल एक बड़ी अच्छी बात कही। उन्होंने कहा कि हमने जुआ नहीं खेला, जोखिम लिया था। ट्रेडिंग में जुए और जोखिम का यह फर्क समझना ज़रूरी है। ज्यादातर लोग जुए की मानसिकता से ट्रेड करते हैं। यही सोच उन्हें डुबाती है। हमें पता होना चाहिए कि किस ट्रेड में कितना पाने के लिए कितना जोखिम ले रहे हैं। क्या बाज़ार आज छुएगा ऐतिहासिक शिखर…औरऔर भी

हर दिन सैकड़ों शेयर बढ़ते हैं, सैकड़ों गिरते हैं। जैसे, कल एनएसई में 677 शेयर बढ़े तो 481 गिरे। इन सभी में ट्रेडिंग के अवसर थे। लेकिन कौन बढ़ा, कौन घटा, यह हो जाने के बाद पता चलता है। हमें इन अवसरों को पहले पकड़ना होता है ताकि अपनी पूंजी बढ़ा सकें। हर ट्रेडर अपनी रिस्क प्रोफाइल के हिसाब से शेयर चुनता है। लेकिन हमारा मकसद होना चाहिए न्यूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न। अब आज का बाज़ार…औरऔर भी

ज़िंदगी में बहुत सारी घटनाएं बिना बुलाए चली आती है, जबकि कुछ का पता पहले से रहता है। इन घटनाओं के वक्त हम क्या करते हैं, इसी से हमारे लिए उसका फल तय होता है। लेकिन कभी-कभी कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिन पर कुछ न करना ही सबसे अच्छी रणनीति है। आज मौद्रिक नीति की दूसरी त्रैमासिक समीक्षा के रूप से ऐसी ही घटना होने जा रही है। इसे देखिए, समझिए। लेकिन ट्रेडिंग बहुत सावधानी से…औरऔर भी

बंद भाव बड़ा महत्वपूर्ण है। तमाम विश्लेषणों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शेयर के बंद भाव दिन के आखिरी भाव नहीं होते। दरअसल तीन से साढ़े तीन बजे तक जितने भी सौदे होते हैं, उनके भारित औसत से बंद भाव निकलता है। आप खुद एनएसई की वेबसाइट पर जाकर तस्दीक कर सकते हैं कि किस तरह बंद भाव अलग होता है और आखिरी भाव अलग। अब शुरुआत नए सप्ताह की…औरऔर भी

कोई भी शेयर अपनी सहूलियत से खरीदें, न कि दूसरों के दबाव और बाजार के शोरशराबे पर। वो भी तब, जब भाव अपने माफिक आ जाए। सौ-पचास स्टॉक्स खरीदने की जरूरत नहीं। आठ-दस साल में दौलत पैदा करने के लिए पांच-दस स्टॉक्स ही काफी हैं। तथास्तु में आज एक ऐसी कंपनी जो पिछले 15 सालों से अपने मुनाफे का 3/4 हिस्सा शेयरधारकों में बांटती रही है। इसका शेयर अभी महंगा है। थोड़ा नीचे आए तभी खरीदना है…औरऔर भी

अल्गोरिदम ट्रेडिंग या हाई फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग का नाम आपने सुना ही होगा। जानते भी होंगे कि इसमें ट्रेडिंग का सारा काम कंप्यूटर सॉफ्टवेयर करते हैं। करोड़ों का दांव खेलनेवाली संस्थाएं इस तरह की ट्रेडिंग का सहारा लेती है। हमें पांच-दस फीसदी की कमाई चाहिए होती है, जबकि अल्गो ट्रेडिंग में पांच-दस पैसे का लाभ एक-एक दिन में लाखों की कमाई करा देता है। सवाल उठता है कि क्या इस हाई फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग का मुकाबला हम जैसे आमऔरऔर भी

सेंसेक्स तीन साल बाद फिर 21,000 को लांघ गया। लेकिन तब यह चौबीस के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा था, अभी अठ्ठारह पर। तब बुक वैल्यू से चार गुना था, अभी 2.8 गुना। क्या अभी बाज़ार के और उठने की गुंजाइश है? देखेंगे, तब की तब। गंभीर मसला यह है कि तब बाज़ार के टर्नओवर में रिटेल निवेशकों की भागीदारी लगभग आधी थी। अभी एक-तिहाई है। संस्थागत निवेशक हावी हैं बाज़ार पर। फिर, कैसे निकालें राह…औरऔर भी

आपने देखा होगा कि दो-ढाई बजे निफ्टी में अचानक तेज़ मोड़ आता है। दरअसल यह बड़े निवेशकों, खासकर संस्थाओं का खेल है। वे निफ्टी के चुनिंदा दो-तीन शेयर बड़ी मात्रा में खरीदते/बेचते हैं। निफ्टी खटाक से दिशा बदलता है। वे उसी समय कॉल व पुट ऑप्शन के सौदे करते हैं। बहुतों का स्टॉप-लॉस ट्रिगर हो जाता है। पर संस्थाएं थोड़ी ही देर में जमकर कमा लेती हैं। बाज़ार में चलती हैं ऐसी कारस्तानियां। अब ट्रेडिंग गुरु की…औरऔर भी

कभी-कभी नहीं, अक्सर हम इधर-उधर की चंद सूचनाओं के चलते या मन से किसी शेयर के बारे में धारणा बना लेते हैं कि वो बढ़ेगा/घटेगा। फिर उसके भावों का चार्ट देखते हैं। कोई न कोई आकृति, कोई न कोई इंडीकेटर हमारी पुष्टि करता दिख जाता है। दांव लगा बैठते हैं। शेयर हमारे माफिक चला तो खुश, नहीं तो सारा दोष किस्मत का। सरासर गलत तरीका। जो है, उसे देखिए। अपनी धारणा मत थोपिए। अब रुख बाज़ार का…औरऔर भी