डोनाल्ड ट्रम्प ने मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) का नाम लेकर टैरिफ-टैरिफ की चिल्ल-पों और अपने दूसरे कर्मों से अमेरिका को बर्बादी की ढलान पर डाल दिया है। वहीं, चीन अपनी मैन्यूफैक्चरिंग के दम पर विश्व विजय के अभियान पर निकल पड़ा है। उसने कनाडा से आयात होनेवाले कैनेला के बीजों पर टैरिफ 84% से घटाकर 15% करने के बदले वहां निर्यात की जानेवाली इलेक्ट्रिक कारों पर टैरिफ 100% से घटवा कर मात्र 6.1% करा लिया। चीनऔरऔर भी

ट्रम्प के 50% टैरिफ लगाने का हल्ला मचाया जा रहा है। 500% टैरिफ तक की बात कही जा रही है। लेकिन हकीकत यह है कि भारत के निर्यात में टैरिफ से बड़ी समस्याएं आंतरिक हैं। 25 नवंबर 2025 को बोर्ड ऑफ ट्रेड की बैठक में देश के विभिन्न राज्यों से आए निर्यातकों से खुद वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से शिकायत की कि उन्हें कच्चा माल वैश्विक कीमतों से 15-20% महंगा मिलता है। बहुत सारे राज्यों में मालऔरऔर भी

अमेरिका से लेकर ब्रिटेन और जर्मनी तक, दुनिया के तमाम देश अपने हितों को सबसे ऊपर रखकर भारत से व्यापार वार्ता और संधि कर रहे हैं। चीन तक अपने उद्योगों के हित में भारत का इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन भारत का हित आज हाशिए पर पड़ा है क्योंकि यहां करीब 12 सालों से ऐसी सरकार चल रही है जिसके लिए भारत का हित मतलब अडाणी जैसे उन चंद यारों का हित हो गया है जो उसेऔरऔर भी

देश किसी भी व्यक्ति से बहुत-बहुत ऊपर होता है, चाहे वो देश का प्रधानमंत्री ही क्यों न हो। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इसके अपवाद नहीं हो सकते। लेकिन भाजपा सरकार और संघ परिवार के संगठन मोदी की घरेलू व विदेश नीति की निष्पक्ष समीक्षा करने के बजाय नितांत फर्जी तरीकों से उन्हें भारत देश से भी बड़ा बनाने के अभियान में लगे हैं। इसके लिए इतिहास तक को गलत तरीके से पेश किया जा रहाऔरऔर भी

दुनिया के रंगमंच पर भारत की इस समय विचित्र स्थिति है। विदेशी निवेशक भारतीय अर्थव्यवस्था के बेदम हाल को देखकर किनारा कस रहे हैं। विदेश में कार्यरत भारतीयों को जगह-जगह उलाहना का पात्र बनना पड़ रहा है। जब पता चलता है कि जर्मनी में काम कर रहे भारतीय लोग वही काम कर रहे जर्मनों से 20% ज्यादा कमा रहे हैं, साथ ही भारत में क्रिसमस के मौके पर ईसाइयों पर हमले होते हैं तो यूरोप के कईऔरऔर भी

किसी भी देश का बनना-बिगड़ना उसके प्राकृतिक व मानव संसंधनों के कुशल नियोजन पर निर्भर करता है। यही राष्ट्र-निर्माण का बुनियादी आधार है। भारत के पास तो पांच हज़ार पुरानी सभ्यता की समृद्ध विरासत भी है। लेकिन जिस तरह मोदी सरकार बारह सालों से देश के प्राकृतिक संसाधनों को अडाणी व अम्बानी जैसे चंद यारों के हवाले करती जा रही है और उसने 81.35 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन, दस करोड़ किसानों को सरकारी अनुदान, 11 करोड़औरऔर भी

कोई भी जीत या हार अकारण नहीं होती। अमेरिका और चीन आज अगर एआई में इतने आगे निकल गए हैं तो उसकी ठोस वजह है। भारत अगर प्रतिभाओं का विपुल भंडार रखने के बावजूद इतना पीछे छूट गया है तो इसकी व्यक्तिगत नहीं, सरकारी वजह है। अमेरिका में डार्पा (डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी) व नेशनल साइंस फाउंडेशन के साथ ही सिलकॉन वैली के वेंचर कैपिटल फंडों ने दशकों से एआई रिसर्च पर अरबों डॉलर झोंके हैं।औरऔर भी

घोषणा करने में मोदी सरकार को भारत क्या, दुनिया में कोई मात नहीं दे सकता। लेकिन घोषणाओं को ज़मीन पर उतारने में वो इतनी फिसड्डी है कि उसकी कहीं कोई मिसाल नहीं मिलती। हमारे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने करीब दो साल पहले 7 मार्च 2024 को इंडिया एआई मिशन की घोषणा की और इसके लिए 10,300 करोड़ रुपए से ज्यादी की रकम आवंटित कर दी। कंप्यूटिंग क्षमता, इनोवेशन सेंटर, डेटासेट प्लेटफॉर्म, एप्प डेवपलमेंट इनिशिएटिव, फ्यूचर स्किल्स और स्टार्ट-अपऔरऔर भी

नए साल के बजट पर विचार करने से पहले पता लगाना ज़रूरी है कि आखिर बजट में घोषणा के बाद चालू वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान शिक्षा व शोध में अब तक हमारी क्या उपलब्धि रही है? बजट में दावा किया गया था कि शिक्षा पर ₹1,28,650 करोड़ आवंटित किए जा रहे है। हकीकत में यह 2024-25 के बजट आवंटन ₹1,25,638 करोड़ से मात्र 2.40% ज्यादा था और कुल ₹50,65,345 करोड़ के बजट का 2.54% ही था।औरऔर भी

यह महज संयोग है, प्रयोग है या चंद उद्योगपतियों के हितों व विज़न को 146 करोड़ भारतवासियों के हितों व ज़रूरत का पर्याय बना देना। जिस दिन गौतम अडाणी ने बारामती में शरद पवार की मौजूदगी में खुद अपने समूह द्वारा वित्तपोषित एआई सेंटर ऑफ एक्सेलेंस का उद्घाटन किया, ठीक उसके अगले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में अर्थशास्त्रियों के साथ बजट-पूर्व बैठक की, जिसमें एआई में उत्कृष्टता केंद्र बनाने का सुझाव सबसे प्रमुखता सेऔरऔर भी