किसी समय रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को शेयर बाज़ार का किंग कहा जाता था। इसके मुखिया धीरूभाई अंबानी के बारे में माना जाता था कि बाज़ार उनके इशारों पर नाचता है। जुलाई 2002 में उनके देहांत के बाद भी माना गया कि बाज़ार में अंबानी भाइयों की तूती बोलती है। लेकिन 2005 से यह स्थिति बदलने लगी। अब बाज़ार में एफआईआई समेत ऐसे खिलाड़ी आ गए हैं जो बाज़ार की दिशा तय करते हैं। इसके मद्देनजर बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

भारत ही नहीं, दुनिया भर में शेयर, कमोडिटी, फॉरेक्स बाज़ार के तमाम ट्रेडर पिछले भावों का चार्ट देखकर फैसला लेते हैं। लेकिन चार्ट तो सबके लिए समान है, फिर फैसले अलग-अलग क्यों? ऐसी चकरघिन्नी क्यों? एक ही वक्त किसी को मंदी तो किसी को तेज़ी नजर आती है! बात ऐसी भी नहीं कि जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। फर्क है आम तस्वीर के खास संकेतों को पकड़ने का। अब पकड़ें बुध का ट्रेड…औरऔर भी

शेयरों की ट्रेडिंग में या तो आप जीतते हैं या हारते हैं। यहां जीत-हार के बीच की कोई चीज़ नहीं होती। बाज़ार में बहुत-से सौदे न्यौता देकर बुलाते हैं कि आओ! हमें झपटकर ले जाओ। लेकिन ज्यादातर इनके पीछे उस्तादों का फैलाया जाल/ट्रैप होता है जिसमें फंसकर आप अपनी पूंजी गंवा बैठते हैं। दूसरी तरफ कम रिस्क और ज्यादा लाभ के सौदे होते हैं जिन्हें हमें तलाशकर निकालना होता है। काम बड़ा दुश्कर है। बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

शेयरों के भाव लंबे समय में यकीनन कंपनी के कामकाज और भावी संभावनाओं से तय होते हैं। लेकिन पांच-दस दिन की बात करें तो बड़े खरीदार या विक्रेता उनमें मनचाहा उतार-चढ़ाव ला देते हैं। यह भारत जैसे विकासशील बाज़ार में ही नहीं, अमेरिका जैसे विकसित बाज़ार तक में होता है। इधर एल्गो ट्रेडिंग के बारे में कहा जा रहा है कि उसने भावों का पूरा सिग्नल ही गड़बड़ा दिया है। इन सच्चाइयों के बीच हफ्ते का आगाज़…औरऔर भी

हम अगर शेयर बाज़ार में निवेश करते हैं तो कंपनियों के विकास में हिस्सेदारी करते हैं। आईपीओ के जरिए प्राइमरी बाज़ार में लगाया गया धन बिना किसी ब्याज व देनदारी के सीधे कंपनी को मिल जाता है। ऐसा न हो तो कंपनी के लिए पूंजी की लागत बढ़ जाएगी। सेकेंडरी बाज़ार/स्टॉक एक्सचेंज इस निवेश के रिस्क को संभालने का माध्यम हैं। वो हमें जब चाहें, निकल जाने का मौका देता है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

विचित्र, किंतु सत्य है कि शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाई शिव का धनुष तोड़ने जैसा पराक्रम हो गया है। बड़े-बड़े महारथी बड़े दम-खम और दावे के साथ ट्रेडिंग में उतरते हैं। लेकिन शिव का धनुष तोड़ने की बात तो छोड़िए, उसे टस से मस तक नहीं कर पाते। मैं यह बात हवा में नहीं, बड़े-बड़े महारथियों से बातचीत के आधार पर कह रहा हूं। कुछ दिन पहले की बात है। इंजीनियरिंग छोड़कर होलटाइम ट्रेडिंग में लगेऔरऔर भी

हर निवेशक/ट्रेडर के दो सबसे बड़े दुश्मन हैं उसका अपना अतिविश्वास और भीड़ की मानसिकता। हम ताल ठोंककर मानते हैं कि जितना जान सकते हैं, उससे भी ज्यादा जानते हैं। भीड़ की मानसिकता यह है कि ज्यादातर लोग ऐसा कर रहे हैं तो हमें भी वैसा करना चाहिए। हर किसी में ये दोनों प्रवृत्तियां किसी न किसी मात्रा में होती हैं। लेकिन ये दोनों ही हमारी मेहनत से जुटाई पूंजी को खा जाती हैं। समझिए, बचिए, बढ़िए…औरऔर भी

शेयरों के भाव और कंपनी नतीजों में क्या आज और अभी का सीधा संबंध है? अगर होता तो कल पंद्रह तिमाहियों के बाद पहली बार शुद्ध लाभ में बढ़ोतरी, वो भी शानदार 115% की, हासिल करने के बावजूद भारती एयरटेल का शेयर 1.52% गिर नहीं गया होता! यहीं काम करती हैं उम्मीदें। एयरटेल इसलिए गिरा क्योंकि उससे ज्यादा शुद्ध लाभ की उम्मीद थी और जनवरी में दिसंबर तक की उम्मीद हवाई नहीं होती। अब गुरु का चक्र…औरऔर भी

इस समय दुनिया भर में हाई फ्रीक्वेंसी और अल्गोरिदम ट्रेडिंग पर बहस छिड़ी हुई है। इस हफ्ते सोमवार और मंगलवार को हमारी पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने भी इस पर दो दिन का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन किया। इससे एक खास बात यह सामने आई कि सेकंड के हज़ारवें हिस्से में ट्रेड करनेवाले ऐसे महारथी भी पहले छोटे सौदों से बाज़ार का मूड भांपते हैं और पक्का हो जाने पर बड़े सौदे करते हैं। अब वार बुधवार का…औरऔर भी

हमने कल बाज़ार खुलने से करीब 45 मिनट पहले ही लिख दिया था कि आज भारी गिरावट का अंदेशा है। इसलिए ज़रा संभलकर। पर निफ्टी 2.09% गिरकर 6135.85 पर पहुंच जाएगा, इतनी उम्मीद नहीं थी। असल में यह बाहरी हवाओं का कोप है। पिछले हफ्ते मात्र दो दिनों में डाउ जोन्स करीब 500 अंक गिरा है। कोई इसका दोष चीन को दे रहा है तो कोई अमेरिका में बांड-खरीद घटाने को। सो, सावधानी से बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी