रिस्क संभालने की रणनीति का आखिरी चरण। इसमें गिनते हैं कि किसी सौदे में चुनी गई कंपनी के कितने शेयर ट्रेडिंग के लिए जाने हैं। मान लीजिए, हमने एसबीआई को 160 पर खरीदना तय किया और पक्का स्टॉप-लॉस 155 रुपए का है। इस तरह एक शेयर पर 5 रुपए गंवाने का रिस्क है। हमारा रिस्क एक सौदे में 500 रुपए डुबाने का है तो हम एसबीआई के 100 (=500/5) शेयर खरीद सकते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

रिस्क संभालने के लिए प्रत्येक ट्रेड में उसकी मात्रा निकालना आवश्यक है। जैसे, हमने दस लाख रुपए का 5% हिस्सा ट्रेडिंग के लिए रखा है तो हमारी ट्रेडिंग पूंजी हुई 50,000 रुपए। पहले से निर्धारित है कि इसका 1% से ज्यादा रिस्क किसी ट्रेड में नहीं उठाएंगे। 50,000 रुपए का 1% निकालने पर रकम बनती है 500 रुपए। इस तरह अनुशासन बना कि किसी भी ट्रेड में 500 से ज्यादा नहीं डुबाना चाहिए। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

कुल पूंजी दस लाख रुपए है तो 50,000 रुपए ही ट्रेडिंग में लगाएं। अगर जोखिम उठाने की क्षमता ज्यादा हो तो पूंजी का 5% से ज्यादा हिस्सा भी लगा सकते हैं। रिस्क संभालने का दूसरा चरण है: किसी भी ट्रेड में ट्रेडिंग पूंजी का 1% से ज्यादा हिस्सा दांव पर कतई न लगाएं। सीखने की शुरुआत में इसे 0.5% तक रखना ज्यादा मुनासिब होगा। मसलन, 50,000 रुपए में से 500 या 250 रुपए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

ट्रेडिंग में कामयाबी के लिए स्टॉक का चयन महत्वपूर्ण है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है रिस्क का प्रबंधन। इसके दो मौलिक सिद्धांत हैं। पहला, किसी भी ट्रेड में अपनी पूंजी के एक निश्चित हिस्से से ज्यादा न लगाएं। दूसरा, किसी ट्रेड में उठाया जानेवाला रिस्क सारी पूंजी की तुलना में बहुत कम हो। इसको अपनाने के चार चरण हैं। पहला चरण है शेयरों में निर्धारित निवेश का 5% से ज्यादा ट्रेडिंग में न लगाएं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

ट्रेडिंग में जो भी ब्रोकर या संस्थाएं असल में कमाते हैं, वे कभी टिप्स का सहारा नहीं लेते; बल्कि उनकी कमाई को कामयाब बनाने के लिए हमारे-आप के बीच टिप्स का जाल फेंका जाता है क्योंकि उनके सौदों को पूरा करने के लिए सामने आ जाएं। यकीनन, वे भी भविष्य की अनिश्चितता झेलते हैं और उसके जोखिम को संभालकर ही कमा पाते हैं। इस हफ्ते हम जोखिम संभालने की रणनीतियां समझेंगे। अब देखते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

भविष्य में वही ट्रेडर बाज़ार में टिक पाएगा जो उपलब्ध डेटा के गहन विश्लेषण को इंसान की सहज बुद्धि व आर्थिक समझ से मिलाकर अपने सौदे तय कर सकेगा। डेटा जुटाना और उसका हर कोण से विश्लेषण करना उसकी उंगलियों के पोरों का खेल होना चाहिए। यह काम वो कंप्यूटर व सॉफ्टवेयर की मदद से कर लेगा। फिर उसमें जब वो इंसानी बुद्धि का तड़का लगाएगा तब समय उसका पूरा साथ देगा। अब करें शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

बाज़ार में पहले तिकड़म बहुत चलता था। हर्षद मेहता से लेकर केतन पारेख तक कंपनियों के मालिकों व बैंकों की मिलीभगत से शेयर को 5 से 500 तक पहुंचाकर खेल करते थे। लेकिन अब यह धंधा हाशिए पर चला गया है। कोई इनसाइडर ट्रेडिंग से जेल जाने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। फिर, कंपनी के लोगों को नतीजों के आसपास कुछ दिनों तक ट्रेडिंग से रोक दिया जाता है। ये अनिवार्य नियम है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

आखिर ट्रेडिंग का भावी स्वरूप क्या होने जा रहा है? पहले सामान्य मूविंग एवरेज़ तक के लिए कैल्कुलेटर लेकर लंबा हिसाब-किताब लगाना पड़ता है। अब बंद भाव ही नहीं, उनके लॉग का चार्ट सेकेंडों में बन जाता है वो भी मुफ्त में। कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की गणनाएं आम प्रचलन में आ गई हैं। अगर आज ट्रेडर को बाज़ार में टिकना है तो उसे कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल में माहिर होना पड़ेगा। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बिजनेस में टिके रहने के लिए समय के साथ चलना ज़रूरी है। जो समय के साथ नहीं चलते, वे मिट जाते हैं। डायनोसोर जैसे भीमकाय जानवर तक बदलते वक्त के साथ न चल पाने के कारण धरती से विलुप्त हो गए। इसी तरह ट्रेडिंग के तौर-तरीके फटाफट बदल रहे हैं। अगर आप कंप्यूटर के बढ़ते उपयोग के बावजूद ऑनलाइन ट्रेडिंग नहीं करते, बल्कि ब्रोकर पर निर्भर हैं तो सरासर गलत हैं। अब पकड़ते हैं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग एक बिजनेस है तो यहां भी लागत को न्यूनतम रखते हुए मुनाफा बढ़ाने के यत्न किए जाने चाहिए। आजकल चार्टिंग सॉफ्टवेयर बेचने वाले बहुतेरे हैं। साल भर का 10-15 हज़ार रुपए लेते हैं, लेकिन उनका डेटा अक्सर अधूरा या करप्ट हो जाता है। सवाल उठता है कि बीएसई व एनएसई जब तमाम इंडीकेटरों के साथ खुद मुफ्त चार्टिंग की सुविधा देते हैं तो बाहर से खरीदने की क्या ज़रूरत? अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी