बाज़ार के कुछ लोग पुराने अनुभव से बताते हैं कि गुजरात चुनावों से पहले के पंद्रह दिनों में शेयर बाज़ार अक्सर चढ़ता है, जबकि चुनाव बीतने के बाद के तीस दिनों में अमूमन गिरता है। हालांकि ऐसी मान्यताओं का कोई तार्किक आधार नहीं होता। लेकिन इनका मनोवैज्ञानिक पहलू ज़रूर होता है। सोचने की बात है कि साल भर से बढ़ रहे बाज़ार में कहीं इस गिरावट का आगाज़ तो नहीं हो गया है? अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

इस समय बाज़ार को राजनीति का ज़ोर और एलआईसी जैसी घरेलू संस्थाओं की खरीद चढ़ाए जा रही है। म्यूचुअल फंड भी आम निवेशकों की लालच को आगे बढ़ाए जा रहे हैं। भाजपा की सामान्य जीत पर यह हाल है। 150 सीटें पाने पर तो बाज़ार में आग लग जाती। वास्तविकता यह है कि आगे 2019 में केंद्र में सरकार बनाने का भाजपा का रास्ता कठिन हो गया है। इसलिए देर-सबेर करेक्शन अवश्यंभावी है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार ने कल गुजरात में मतगणना के शुरुआती रुझानों के बाद सुबह-सुबह जैसा गोता लगाया और फिर उबरा, उसने एक बार फिर इस नियम की पुष्टि की है कि तगड़ी न्यूज़ के दिन आम ट्रेडरों को बाज़ार से दूर रहना चाहिए। अन्यथा, ऐसा झटका लगता है कि सारी पूंजी एक झटके में स्वाहा हो जाती है। बड़े खेलें, अच्छी बात है क्योंकि उनकी बड़ी औकात है। लेकिन छोटों को संभलकर चलना होगा। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार या कोई अन्य बाज़ार हो अथवा लोकतांत्रिक चुनाव, उसमें छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। लेकिन भारत जैसे देश में फिलहाल इस तरह की शुद्धता व्यवहार में नहीं मिलती। शेयर बाज़ार में इनसाइडर ट्रेडिंग चलती है। शेयरों के भावों से छेड़छाड़ की जाती है। हमें इस हकीकत को स्वीकार करके चलना पड़ेगा। साथ ही राजनीति में भी जोड़तोड़ ही नहीं, ईवीएम तक से छेड़छाड़ बढ़ती जा रही है। इसे रोकना होगा। अब परखते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

बाज़ार की तरह जीवन में भी अनिश्चितता कोई कम नहीं। पिछले गुरुवार (26 अक्टूबर) को 101 डिग्री तक बुखार चढ़ा तो लगा कि क्रोसीन वगैरह लेकर मामला ठीक हो जाएगा। लेकिन अगले दिन वो और चढ़ गया। 102 बुखार में किसी तरह शुक्रवार का कॉलम लिखा। दोपहर होते-होते बुखार 103 के पार चला गया। हालत इतनी खराब हो गई कि अंततः अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। कल ही रात अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर वापस आया हूं।औरऔर भी

अब तक के महानतम ट्रेडरों में बहुतेरे ऐसे हैं जो आधे से ज्यादा सौदों में घाटा उठाते रहे। लेकिन इससे उनकी कमाई पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। कारण यह कि वे घाटेवाले सौदों से जल्दी से जल्दी निकलते रहे, जबकि मुनाफेवाले सौदों में लंबे वक्त तक बने रहे। तब ट्रेडरों के पास आज जैसी चार्टिंग की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। आज तो आधे से ज्यादा सौदों में मुनाफा कमाना अपेक्षाकृत आसान है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हर सौदा सही नहीं बैठेगा। उनमें आपको घाटा उठाना पड़ेगा। लेकिन यह स्वाभाविक है और इसमें कहीं कोई गड़बड़ नहीं। याद रखें कि जीतने और हारनेवाले सौदों का अनुपात ट्रेडिंग में सबसे कम महत्व रखता है। सबसे अहम है आपके औसत लाभ और औसत नुकसान का अनुपात। इसे समझ पाना अधिकांश लोगों के लिए बहुत मुश्किल होता है क्योंकि अमूमन लोगों की इच्छा हर वक्त, हर सौदे में सही रहने की होती है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

सामने बेचनेवाला या खरीदनेवाला कौन है और क्या वह भावना में बहकर सौदे कर रहा है या तर्क के चलते? यह सवाल आपको वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग का कोई सौदा करने से पहले खुद से ज़रूर पूछना चाहिए। यह हकीकत कभी नज़रअंदाज़ न करें कि बाज़ार में भावना से काम करनेवाले हमेशा तर्क से काम करनेवालों के लिए स्थाई कमाई का ज़रिया बने रहते हैं। तय करें कि आपको कैसे काम करना है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार का निवेश ज़ीरोसम गेम नहीं है। उसमें विक्रेता और खरीदार, दोनों का फायदा संभव है क्योंकि बीच में समय आकर निवेश का मूल्य बढ़ा सकता है। लेकिन शेयरों या वित्तीय बाज़ार की किसी भी ट्रेडिंग में बेचनेवाले का नुकसान खरीदनेवाले का फायदा या इसका उल्टा होता है। फिर भी घाटा खाने से कोई सबक नहीं सीखता और बाज़ार सदियों से चलता ही जा रहा है। इसकी मनोवैज्ञानिक वजह क्या है आखिर? अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

बाज़ार अगर सही तरीके से काम करे तो यह अद्भुत व्यवस्था है। यहां बेचनेवाले का फायदा होता है और खरीदनेवाले का भी। विक्रेता को माल या सेवा के बदले नोट मिलते हैं, जबकि खरीदार को नोट के बदले मूल्य मिल जाता है। उसने खर्च किए गए नोटों से कहीं ज्यादा उपयोगिता और काम की चीज़ मिल जाती है। लेकिन क्या यही नियम शेयर बाज़ार पर भी लागू होता है? अब नए संवत के पहले सोमवार का व्योम…औरऔर भी