रुपए के कमज़ोर और कच्चे तेल के महंगा होते जाने से देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत नकारात्मक असर पड़ेगा। कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ता जाएगा। देश से ज्यादा डॉलर निकलेंगे। नतीजतन चालू खाते का घाटा बढ़ता जाएगा। सरकार को ज्यादा ऋण उठाना पड़ेगा तो देश का राजकोषीय घाटा बढ़ जाएगा। महंगाई भी बढ़ेगी तो रिजर्व बैंक किसी भी सूरत में ब्याज दर नहीं घटा पाएगा। ऊपर से साल भर बाद चुनाव हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

रुपए की कमज़ोरी से समान आयात के लिए हमें ज्यादा डॉलर चुकाने होंगे। भारत अपनी 83% तेल ज़रूरत आयात से पूरी करता है। लेकिन कच्चे तेल का अंतरराष्ट्रीय दाम बढ़ते-बढ़ते 80 डॉलर/बैरल को पार कर चुका है। यह बीते चार साल का उच्चतम स्तर है। मई 2014 से जनवरी 2016 के बीच कच्चे तेल के दाम 74% लुढ़क गए थे तब प्रधानमंत्री मोदी ने इसे अपनी किस्मत कहा था। लेकिन आगे संकट है! अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

रुपया कमज़ोर पड़ता जा रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपया 68 के नीचे जा चुका है। जानकार कहते हैं कि जिस तरह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक लगातार भारत से डॉलर निकाल रहे हैं और रिजर्व बैंक के तमाम उपाय जिसे नहीं रोक पा रहे, उसमें रुपया जल्दी ही 70 तक पहुंच जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। इससे आईटी समेत तमाम निर्यातक कंपनियों को लाभ होगा। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह अशुभ संकेत है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारत में शुद्ध रूप से मुनाफा कमाने आए हैं, अर्थव्यवस्था या शेयर बाज़ार को चमकाने के लिए नहीं। देश-विदेश की मौजूदा हालात को देखते हुए उन्होंने चालू वित्त वर्ष 2018-19 के अप्रैल माह में हमारे शेयर बाज़ार व बांडों से 15,561.48 करोड़ रुपए निकाले थे। उसके बाद कल 17 मई तक वे 17,897.84 करोड़ रुपए और निकाल चुके हैं। गनीमत है कि घरेलू संस्थाओं ने बाज़ार को संभाल रखा है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

बड़ी कंपनियों ने धंधा किसी तरह संभाल लिया है। पर, छोटी कंपनियों की हालत खस्ता बनी हुई है। पिछले वित्त वर्ष 2016-17 में बीएसई स्मॉलकैप सूचकांक में शामिल कंपनियों का औसत इक्विटी पर रिटर्न मात्र 3% रहा था। इससे पिछले दो सालों में भी यह क्रमशः 2% और 3% रहा था। 2017-18 का हाल शायद ही कोई चमत्कार दिखाए। फिर भी बीएसई स्मॉलकैप सूचकांक 78.25 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

कंपनियों के चौथी तिमाही के नतीजों का दौर चल रहा है। कल व परसों हिंदुस्तान यूनिलीवर, बॉम्बे डाइंग, एब्बट इंडिया, ल्यूपिन, पंजाब नेशनल बैंक, ब्रिटानिया, आर कॉम व सिंडीकेट बैंक के नतीजे आए तो आज से लेकर शुक्र तक हिंडाल्को, टाटा स्टील, आईटीसी, वोल्टाज़, जे के टायर, अशोक लेलैंड, बजाज ऑटो, डालमिया भारत व डेन नेटवर्क्स जैसी कई कंपनियों के नतीजे आने हैं। देखना यह है कि ये नतीजे क्या कह रहे हैं। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

बीते हफ्ते केनरा बैंक, इलाहाबाद बैंक, यूको बैंक और देना बैंक के नतीजों से पता चला कि इन चार सरकारी बैकों को मार्च तिमाही में 11,729 करोड़ रुपए का सम्मिलित घाटा लगा है। यही नहीं, बढ़ते एनपीए के चलते इस दौरान निजी क्षेत्र के आईसीआईसीआई बैंक का शुद्ध लाभ 45% घट गया, जबकि एक्सिस बैंक को लिस्टिंग के बाद पहली बार शुद्ध घाटा हुआ, वो भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि 2188.7 करोड़ रुपए का। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाजार मूलतः देश की औद्योगिक प्रगति का आईना है। लेकिन अपने यहां संस्थाओं व अमीरतम लोगों की मोटी रकम आने से बाज़ार कमज़ोर होती औद्योगिक स्थिति के बावजूद फूलकर कुप्पा हुआ पड़ा है। ताज़ा आंकड़ा आया है कि मार्च में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक की वृद्धि दर घटकर 4.4% रह गई है, जबकि उससे पहले के चार महीनों की औसत दर 7.6% रही थी। यही नहीं, देश का निर्यात भी घट गया है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

पहली अक्टूबर से हमारे प्रतिभूति बाज़ार में बड़े परिवर्तन होने जा रहे हैं। स्टॉक एक्सचेंजों को शेयरों के साथ ही कमोडिटी डेरिवेटिव में ट्रेडिंग की इजाजत दी जा चुकी है। इसके अलावा इक्विटी डेरिवेटिव की ट्रेडिंग का समय सुबह 9 बजे से शाम 3.30 बजे से बढ़ाकर मध्यरात्रि 11.55 बजे तक कर दिया गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि कमोडिटी डेरिवेटिव की ट्रेडिंग सुबह 10 बजे से रात 11.55 बजे तक हो रही है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

डाउ सिद्धांत का नया रूप यह है कि शेयर बाज़ार में मार्क-अप, डिस्ट्रीब्यूशन और मार्क-डाउन के तीन दौर होते हैं। मार्क-अप में सबसे पहले समझदार निवेशक व कंपनियों के अंदर के लोग एंट्री लेते हैं। इसके बाद बैंक, वित्तीय संस्थाएं व प्रोफेशनल ट्रेडर घुसते हैं। म्यूचुअल फंड सबसे अंत में आते हैं। डिस्ट्रीब्यूशन के दौर में रिटेल ट्रेडर घुसते हैं। मार्क-डाउन में समझदार सबसे पहले और म्यूचुअल फंड सबसे बाद में निकलते हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी