जब हर तरफ मोदी सरकार का दोबारा सत्ता में आना लगभग तय माना जा रहा है, तब आखिर 3 मई के बाद से हमारा शेयर बाज़ार बराबर क्यों रपट रहा है? छह दिनों की ट्रेडिंग में निफ्टी 3.80% टूट गया। अगस्त 2011 के बाद बाज़ार केवल बारह बार इतने कम समय में इतना ज्यादा गिरा है। कहीं उसे पूर्वाभास तो नहीं हो गया कि ‘फिर एक बार, मोदी सरकार’ नहीं बनने जा रही! अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

लंबे समय तक झूठ की झांकी न जीवन में चलती है, न राजनीति में और न ही अर्थव्यवस्था या शेयर बाज़ार में। हालात सच के धरातल पर उतर आएं, यही सबके लिए अच्छा होता है। मगर जब तक गुबार शांत नहीं होता, तब तक सच गर्दो-गुबार में ढंका रह सकता है। यह धूल-धक्कड़ किसी सदिच्छा से खत्म नहीं होगी। इसमें समय लगेगा। लेकिन तब तक आम ट्रेडर को पूरा होशो-हवास बनाए रखना होगा। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

आज स्थिति यह है कि सेंसेक्स और निफ्टी में शामिल बहुतेरी कंपनियों के फंडामेंटल कमजोर या ठहरे पड़े हैं। पर तेज़ड़िए उन्हें चढाए पड़े हैं। गुब्बारा फूलता जा रहा है। यह यकीनन किसी दिन फूटेगा। लेकिन जब फूटेगा तब जो असावधान हैं, उन्हें खून के आंसू रोने पड़ेंगे। मजबूरन साल 2008 को याद करना पड़ेगा, जब दिग्गजों तक को धूल चाटनी पड़ी थी। उसके बाद बाज़ार तब उठेगा जब कंपनियों के फंडामेंटल सुधरेंगे। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार में अजीव-सा उन्माद/सन्निपात छाया है। इस वास्तविकता को कोई तवज्जो नहीं दे रहा कि शेयर बाज़ार हमेशा चक्रों में चलता है। तेज़ी के बाद मंदी का दौर आता ही है। न मंदी अनंत समय तक चलती है और न ही तेज़ी। उसी तरह जैसे सर्दियों के बाद गरमियां अनिवार्यतः आती हैं। मंदी बाज़ार के मूल्यांकन को वाजिब व तर्कसंगत स्तर पर ले आती है। लेकिन तेजी से उत्साहित ट्रेडर समझते ही नहीं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का धन बराबर आ रहा है। अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने का मुद्दा नेपथ्य में जा चुका है। एलआईसी जैसी देशी संस्थाओं का धन भी आ रहा है। कंपनियों के नतीजे भले कमज़ोर निकल रहे हों, लेकिन धन का अटूट प्रवाह चुनिंदा शेयरों को उछाले जा रहा है। सेंसेक्स और निफ्टी थोड़ा दबने के बाद फिर उठ जाते हैं। ट्रेडरों को यकीन है कि बाज़ार अनंत समय तक बढ़ता रहेगा। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार खतरनाक ज़ोन में पहुंच गया है। 16 अप्रैल 2019 को निफ्टी अब तक के सबसे ज्यादा पी/ई 29.42 पर ट्रेड हुआ। शुक्रवार, 3 मई को उसका पी/ई अनुपात 29.34 रहा है। बता दें कि 9 जनवरी 2008 को जब बाज़ार ऐतिहासिक ऊंचाई से फिसला था, तब भी निफ्टी का पी/ई अनुपात 28.22 ही था। अगले नौ महीने में 27 अक्टूबर 2008 तक वह टूटकर 10.68 के पी/ई तक गिर गया। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अब तक पिछले बीस सालों में जिन चुनावी सालों में सेंसेक्स जमकर बढ़ा है, उस दौरान वह चार मौकों पर अपने दीर्घकालिक औसत से कम पी/ई पर ट्रेड हो रहा था। लेकिन इस साल वह औसत पी/ई से ज्यादा स्तर पर ट्रेड हो रहा है। इसलिए अधिक आशंका इस बात की है कि इस साल चुनावों के बाद चाहे मोदी सरकार दोबारा सत्ता में आए या दूसरी सरकार बने, बाजार गिर सकता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

जबरदस्त चुनावी सरगरमियां। चुनाव का साल। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि पिछले बीस सालों में बीएसई सेंसेक्स में 50% से ज्यादा बढ़त उन सालों में हुई है जिनमें लोकसभा के चुनाव हुए थे। दिसंबर 1998 से अप्रैल 2019 तक सेंसेक्स 36,000 अंक बढ़ा है। इसमें से करीब 20,000 अंकों की वृद्धि साल 1999, 2004, 2009 और 2019 में अप्रैल अंत तक हुई है। ये सभी चुनावों के साल रहे हैं। क्या होगा आगे? अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

चार चरणों का मतदान हो चुका। तीन चरणों का बाकी। अंतिम सातवां चरण 19 मई को संपन्न होगा। सुप्रीम कोर्ट ने 21 विपक्षी दलों की याचिका पर आधे ईवीएम में पड़े वोटों को वीवीपैट की पर्चियों से मिलाने का फैसला न सुनाया तो 23 मई को स्पष्ट हो जाएगा कि अगले पांच सालों के लिए केंद्र में किसकी सरकार बनेगी। जाहिर है कि शेयर बाज़ार दिल थामकर नतीजों का इंतज़ार कर रहा है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

रिटेल ट्रेडर के लिए शेयर बाज़ार से नियमित मुनाफा कमाना शेर के जबड़े से शिकार छीन लेने जैसा काम है। अंतर बस इतना है कि इसमें दुस्साहस नहीं, बल्कि शांति व समझदारी से काम करना पड़ता है। हालांकि बाज़ार में सक्रिय ज्यादातर लोग करोड़पति से कम नहीं होते। लेकिन बाज़ार को उन आम लोगों के बीच समृद्धि के वितरण का माध्यम माना जा सकता है जो उसकी कला व विज्ञान को समझते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी