किसी देश या अर्थव्यवस्था में नीतिगत ब्याज दर क्या है, सरकारी बांडों पर ब्याज की वर्तमान दर क्या है, बैंक कितने ब्याज पर उद्योग जगत को उधार देते हैं और रिटेल व थोक मुद्रास्फीति क्या चल रही है, इनका बड़ा गहरा रिश्ता शेयर बाज़ार समेत कमोडिटी व फॉरेक्स बाज़ार तक से होता है। इनसे देशी मुद्रा की विनिमय दर भी जुड़ी है। इसलिए बाज़ार में कितने डॉलर आएंगे, इससे भी इनका वास्ता होता है तो विदेशी बाजारऔरऔर भी

ट्रेडर का दिमाग जितना शांत व खुला रहेगा, वह उतना ही बारीकी से सामनेवालों के स्वभाव व बर्ताव का पैटर्न देख पाएगा। किस तरह के ट्रेडर सुबह भाव खोलते हैं और कौन-से ट्रेडर शाम को बंद करते हैं, बीच में दोपहर के समय लंच के दौरान कैसे ट्रेडर चांदी काटते हैं, डे-ट्रेडरों की क्या भूमिका है, देशी-विदेशी संस्थागत निवेशकों की क्या सक्रियता है – ऐसे बहुतेरे तथ्यों पर हमें पैनी नज़र रखनी होती है। देखना पड़ता हैऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग लाखों लोगों का खेल है। इसलिए इसमें धूर्तता या चालाकियां नहीं चलती। यह दरअसल दिमागदार योद्धाओं का दैनिक संग्राम है। यहां सबसे तेज़ कंप्यूटर, सबसे तेज़ इंटरनेट कनेक्शन या सबसे तेज़ी से रिफ्रेश होनेवाले ब्रोकर टर्मिनल से कमाई नहीं होती। यहां ट्रेडर की कमाई इस बात से होती है कि वह कितनी ज्यादा से ज्यादा काम की सूचनाओं की कितनी तेज़ी से प्रोसेस कर न्यूनतम रिस्क में अधिकतम लाभ के ट्रेड में घुसताऔरऔर भी

कभी सुनी-सुनाई या बताई बातों पर मत जाइए। वॉट्सअप संदेश और सोशल मीडिया पर कतई यकीन न करें क्योंकि वहां निहित स्वार्थी तत्व अफवाहें व झूठी खबरे ही फैलाते हैं। देखिए कि आपका ट्रेडिंग टर्मिनल क्या कह रहा है। ट्रेडिंग टर्मिनल कभी झूठ नहीं बोलता, न बोल सकता है। लम्बे समय का निवेश यकीनन कंपनी की ताकत, प्रतिस्पर्धा की स्थिति और उसके बिजनेस की संभावना जानने की मांग करता है। लेकिन छोटे समय की ट्रेडिंग में मानवऔरऔर भी

हमें बाज़ार का हर भेद समझने की कोशिश में लगे रहना चाहिए। बाज़ार बढ़ा है, यह तथ्य तो सबकी आंखों के सामने है। लेकिन वह नई खरीद के दम पर बढ़ा है या पहले बेचे गए शेयरों की खरीद (शॉर्ट कवरिंग) की मजबूरी के चलते, यह हकीकत सभी को पता नहीं होती। वोल्यूम बढ़ने के साथ शेयर के भाव गिर रहे हों तो साफ है कि शॉर्ट कवरिंग चल रही है। कम वोल्यूम में शेयर चढ़ रहाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार तर्क पर नहीं, भावनाओं व संभावनाओं पर चलता है। जिसे हम तर्क समझते हैं, उसका असर तो बाज़ार चुटकियों में जज़्ब कर चुका होता है। हम उसे अपनाएं, तब तक वह उस्तादों की उंगलियों से गुजरकर टखने तक पहुंच चुका होता। लंबे समय बाद बनी लम्बी ग्रीन कैंडल देखर हमें लगता है कि अब तो खरीद आएगी और शेयर पक्का बढ़ेगा। लेकिन अगले ही दिन वह धसक जाता है। वैसे, तर्क का तथ्य अगर बाज़ारऔरऔर भी

सप्ताह का आखिरी ट्रेडिंग दिन शुक्रवार और उसमें भी ट्रेडिग का आखिरी एक घंटा। शेयर बाजार के अनुभवी ट्रेडर बताते हैं कि इसे गहराई से परखना बड़ा महत्वपूर्ण है। वैसे तो इंट्रा-डे ट्रेडरों के लिए हर दिन की ट्रेडिंग का आखिरी घंटा बहुत अहम होता है क्योंकि उन्हें घाटा हो फायदा, सौदे काटकर निकल जाना होता है। लेकिन शुक्रवार को उनके साथ स्विंग ट्रेडर भी जुड़ जाते हैं क्योंकि वे शनिवार-रविवार को बाज़ार बंद रहने पर देश-दुनियाऔरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार में जब से ऑप्शंस सौदों का साप्ताहिक सेटलमेंट होने लगा है, तब से ट्रेडरों के लिए बुधवार व गुरुवार के भाव और उनका पैटर्न बहुत अहम हो गया है। इसके घेरे में डेरिवेटिव सेगमेंट में शामिल स्टॉक्स आते हैं। एनएसई ने 160 स्टॉक्स और तीन सूचकांकों में डेरिवेटिव ट्रेडिंग की इजाज़त दे रखी है। असल में प्रोफेशनल ट्रेडरों की तरह रिटेल ट्रेडरों को भी अपना कारोबार इन्हीं स्टॉक्स तक सीमित रखना चाहिए क्योंकि इनमेंऔरऔर भी

जिन्हें भावों को पढ़ना आ गया, उनके पैटर्न को समझना आ गया, समझ लीजिए कि उन्होंने शेयर बाज़ार की आधी बाज़ी जीत ली। जिन्होंने भावों और उनके पैटर्न के पीछे सक्रिय साफ-साफ न दिखनेवाले इंसानों या उनके समूहों की शिनाख्त कर ली, समझ लीजिए कि समूचा बाज़ार उनकी मुठ्ठी में आ गया। क्या हमारे-आप जैसे रिटेल ट्रेडर पहले आधी बाज़ी जीतने और फिर बाज़ार पर पूरा अख्तियार हासिल करने की स्थिति में आ सकते हैं? यकीनन। बसऔरऔर भी

जो इंसान शेयर बाज़ार में भावों को चलाते हैं, आखिर उनको कौन चलाता/चलाती है? दरअसल, उनको चलाती हैं इंसान के अंदर समाई लालच व डर की दो प्रबल भावनाएं। छोटा हो या बड़ा, व्यक्ति हो या संस्था, हर कोई लाभ कमाने के मकसद से ही शेयर बाज़ार में उतरता है। कोई तेज़ी का माहौल का हामी होता है और खरीदने के बाद बेचकर कमाता है तो कोई मंदी का हामी होता है और बेचने के बाद खरीदकरऔरऔर भी