वित्त वर्ष 2019-20 में अर्थव्यवस्था मात्र 4% बढ़ी। यह 11 सालों की न्यूनतम दर है। बीता वित्त वर्ष 2020-21 कोरोना की भेंट चढ़ गया। नतीजतन, अर्थव्यवस्था 7% सिकुड़ सकती है। फिर भी पांच साल में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और नए वित्त वर्ष में 11% विकास दर का सब्ज़बाग! राजनीति में ऐसी झांकी चलती है, मगर अर्थनीति में नहीं। 11% नहीं, 12% बढ़ जाए, तब भी नए साल में अर्थव्यवस्था 2019-20 की तुलना में 4.16% ही बढेगी, जबकि बीच का एक साल स्वाहा। अब तथास्तु में आज की कंपनी…और भी

कस्टमाइजेशन का ज़माना है। उत्पाद व सेवाओं को ग्राहक की खास बुनावट व ज़रूरतों के हिसाब से ढाला जाता है। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग व निवेश में भी बिना हायतौबा मचाए कमाना है तो हमें अपने माफिक स्टॉक्स व कंपनियां चुननी होंगी। निवेश का पक्का फॉर्मूला है कि जिस कंपनी का धंधा, उसका बिजनेस मॉडल हमें अच्छी तरह समझ में आ रहा हो, उसी में धन लगाना चाहिए। किसी की नकल नहीं करनी चाहिए क्योंकि नकल मेंऔरऔर भी

भविष्य कोई नहीं देख सकता। कंपनी अच्छी चल रही है। लेकिन तीन-चार साल बाद क्या हाल होगा, पता नहीं। सारी गणनाएं व अनुमान फेल हो सकते हैं। ट्रैक-रिकॉर्ड को परखने के बाद ही हम कंपनी चुनते हैं। फिर भी स्मॉलकैप कंपनी स्किपर का शेयर तीन साल में 210 से 70 तक लुढ़क चुका है, जबकि रत्नमणि मेटल्स चार साल में 455 से 1585 तक उछल गया है। इस बीच लार्जकैप कंपनी लार्सन एंड टुब्रो सात साल मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश का सर्वोत्तम मौका तब होता है जब वो एकदम जमींदोज़ हो। बीते साल 2020 में अप्रैल-मई में ऐसा ही मौका आया था। लेकिन तब कोरोना की मार और कमाई की अनिश्चितता के बीच शेयरों में वही लोग धन लगा सकते थे, जिनके पास इफरात धन था। आम निवेशक हाथ-पेट बांधकर चल रहा था। अब, जब वह थोड़ा निश्चिंत हुआ है तो बाज़ार आसमान पर है। लेकिन कभी-कभी चढ़ा शेयर भी सस्ता होता है।औरऔर भी

शेयर और उनके भाव महज झांकी हैं। इसमें फंसकर निवेश किया तो गच्चा खा जाएंगे। कंपनी के नाम की चमक-दमक में पड़े, तब भी धोखा खा सकते हैं। हमें कंपनी के बिजनेस और उसकी संभावनाओं को परखकर ही निवेश करना चाहिए। तभी वह लंबे समय में फलता-फूलता है। फिलहाल तो बाज़ार की हालत यह है कि सस्ते विदेशी धन के प्रवाह के दम पर बहुतेरे स्टॉक्स फूले पड़े हैं। फिर भी कुछ कंपनियों के शेयर दमदार बिजनेसऔरऔर भी

इस समय अपने शेयर बाज़ार का हाल बड़ा विचित्र है। जिन कंपनियों के शेयर पिछले कुछ महीनों में चढ़ गए, वे सब चढ़े ही जा रहे हैं, जबकि जिन कंपनियों के शेयर कोरोना के कहर में दबे रह गए, वे महीनों से सीमित दायरे में ही ऊपर-नीचे हो रहे हैं। अधिकांश आम से लेकर खास निवेशक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के पीछे भाग रहे हैं तो कोरोना की तात्कालिक मार की शिकार कंपनियों की तरफ कोई देख ही नहीं रहा। आज तथास्तु में सबकी नज़रों से ओझल ऐसी ही एक कंपनी…और भी

अच्छे निवेश के लिए कंपनी की मूलभूत मजबूती, ऋण का बोझ नगण्य या कम से कम होना, बिजनेस की भावी संभावना और प्रवर्तकों की ठीकठाक इक्विटी भागीदारी के साथ-साथ जरूरी है कि उसके शेयर अपेक्षाकृत सस्ते भाव पर उपलब्ध हों। इस शर्त को ‘मार्जिन ऑफ सेफ्टी’ भी कहते हैं। मगर, आज तो बाज़ार में जिसको देखो, वही चढ़ा हुआ है। ऐसे में ‘मार्जिन ऑफ सेफ्टी’ वाले स्टॉक्स खोजना बड़ी चुनौती है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

चुनिंदा सरकारी कंपनियों और बैंकों को छोड़ दें तो जिस भी कंपनी का नाम आपने सुन रखा होगा, किसी बिजनेस चैनल, अखबार, पत्र-पत्रिका या सोशल मीडिया तक में जिसकी चर्चा भर हो गई हो, उसका शेयर अभी सातवें आसमान पर है। याद करें और स्टॉक्स एक्सचेंज में उसके भाव देखें, आपको यकीन हो जाएगा। खरीदनेवाले टूटे पड़े हैं। उन्माद के इस बवंडर में सबकी नज़रों से ओझल कंपनी खोजना मुश्किल है। तथास्तु में आज एक मामूली कंपनी…औरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार नए शिखर पर। सेंसेक्स 32.18 और निफ्टी 36.46 के रिकॉर्ड पी/ई पर पहुंच गए। मगर, आम निवेशक का पोर्टफोलियो अब भी रोये जा रहा है। इसकी बड़ी वजह है बाज़ार में खरीद का मौजूदा पैटर्न। साथ ही कुछ दोष हमारा भी है। हम घाटेवाले शेयरों को भी इस उम्मीद में सहेजे रहते हैं कि कभी तो उठेंगे। हालांकि, नियमतः 20-25% घाटा होते ही हमें उन्हें निकाल देना चाहिए। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

मोदी सरकार गरीबों, किसानों व आमलोगों का भला करने का दावा करती है, लेकिन हकीकत में वह अमीरों व कॉरपोरेट्स का ही भला कर रही है। मसलन, वितरित लाभांश पर पहले कंपनियों को सेस-सरचार्ज मिलाकर 20.56% टैक्स देना पड़ता था। लेकिन इस साल से उन्हें नहीं, बल्कि शेयरधारकों को लाभांश पर टैक्स देना पड़ेगा। सरकार ने कंपनियों के भले के लिए आम निवेशकों को दबाया, खुद भी घाटा उठाया। आज तथास्तु में जमकर लाभांश देनेवाली एक कंपनी…औरऔर भी