बड़े व नामी निवेशक छोटी-छोटी कंपनियों को पकड़ते हैं। जैसे, आकाश कचोलिया देश के सफलतम निवेशकों में गिने जाते हैं। उन्हें मल्टी-बैगर यानी कई गुना बढ़नेवाले स्टॉक्स को पकड़ने का महारथी माना जाता है। उन्होंने शेयर बाज़ार में निवेश से करीब 1700 करोड़ रुपए की दौलत बनाई है। उनके निवेश पोर्टफोलियो की पांच शीर्ष कंपनियां हैं – सफारी इंडस्ट्रीज़, शैली इंजीनियरिंग प्लास्टिक्स, एनआईआईटी, फिलिप्स कार्बन ब्लैंक और रेनबो चिल्ड्रेन्स मेडिकेयर। इनमें से सफारी और एनआईआईटी के अलावाऔरऔर भी

नए साल का पहला दिन आप सभी को बहुत-बहुत मुबारक। रविवार का दिन, फुरसता का दिन। उस सूरज का दिन जो हर तरफ उजाला ही नहीं, बल्कि हमारी समूची सृष्टि में जीवन भरता है। मनुष्य इस जीवन को बेहतर से बेहतर टेक्नोलॉज़ी और अभिनव प्रयासों से और सुंदर बनाता रहता है। लेकिन निवेश की दुनिया में अनुभव का कोई तोड़ नहीं। ज़ोमैटो, पेटीएम और पॉलिसी बाज़ार जैसे स्टार्ट-अप घाटे में हैं और जिस नौजवान पीढ़ी ने लपकऔरऔर भी

किसी कंपनी के शेयर में किया गया निवेश साल-दर-साल अगर बैंक एफडी या सरकारी बॉन्ड से ज्यादा रिटर्न दे रहा है तो मतलब कि आपने सही वक्त पर सही कंपनी पकड़ ली। लेकिन न तो हमेशा ऐसा होता है और न ही सही कंपनी चुनने का कोई अचूक सूत्र है। यकीनन, हमें हर कोण से देखने-परखने के बाद कंपनी चुननी चाहिए। लेकिन पोर्टफोलियो में कुछ कंपनियां शानदार रिटर्न देती हैं तो कुछ फिसड्डी और घाटे का सबबऔरऔर भी

दुनिया में निवेश के भांति-भांति के तरीके और शैलियां हैं। लेकिन अच्छी व संभावनामय कंपनियों के शेयर समय रहते कम भाव पर खरीद लेने की शैली ‘वैल्यू इन्वेस्टिंग’ का कोई तोड़ नहीं है। यह बात ‘अर्थकाम’ खुद करीब साढ़े बारह साल के अपने अनुभव से दावे के साथ कह सकता है। मसलन, हमने अपने लॉन्च के करीब साल भर बाद 18 अप्रैल 2011 को इसी कॉलम में (तब यह कॉलम सबके लिए खुला था) एक स्मॉल-कैप कंपनीऔरऔर भी

ट्रेडिंग में मोमेंटम और निवेश में मूल्य को समय से पहले कम भाव पर पकड़ लेना। शेयर बाज़ार से छोटी और बड़ी अवधि, दोनों में कमाने का सबसे सुंसगत तरीका यही हो सकता है। निवेश को समय से पहले कम भाव पर पकड़ लेने को वैल्यू इन्वेस्टिंग भी कहते हैं। इक्विटी म्यूचुअल फंड निवेश के इसी तरीके से लम्बे समय में कमाते हैं। यह है क्या? मान लीजिए कि आपको परम्परात ज्ञान, बाज़ार व बिजनेस की समझऔरऔर भी

ज्यों-ज्यों निफ्टी 20,000 अंक के करीब पहुंचता जा रहा है, बाज़ार में उन्माद बढ़ता जा रहा है। लेकिन किसी भी किस्म का उन्माद समझदारी को धुंधला कर देता है और हम बहक कर गलत फैसले ले सकते हैं। इसलिए उन्माद में भी हमें संतुलित रहना चाहिए। वहीं, अगर मान लीजिए कि निफ्टी 20,000 का स्तर छूने से पहले ही फिसलकर गिर गया या लम्बे तक सीमित रेंज में भटकता रहे, तब भी हमें न तो हताश होनाऔरऔर भी

अपना शेयर बाज़ार 11 महीने में ही फिर नए ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गया। सेंसेक्स 17 जून से 25 नवंबर 2022 तक के करीब पांच महीनों में नीचे से ऊपर तक 22.64% और निफ्टी 22.07% बढ़ा है। इस दौरान अगर किसी ने निफ्टी ईटीएफ में निवेश किया होता तो यकीकन उसे इसके आसपास रिटर्न मिल गया होता। लेकिन क्या आपके पोर्टफोलियो में शामिल शेयर भी इस दौरान इतने बढ़े हैं? यह आदर्श स्थिति दुनिया का कोई भीऔरऔर भी

भारत में शेयर बाज़ार से कमाने की कारगर रणनीति यही है कि ट्रेडर मौका देखे तो निवेशक बन जाए तो निवेशक को ज़रूरत पड़े तो ट्रेडर बन जाए। वैसे, दोनों के बीच बड़ी साफ विभाजन रेखा है। ट्रेडर हमेशा सटोरिया होता है। वह बहुत कम जानकारी जुटाकर अनजाने में छलांग लगाता है। वहीं, निवेशक कतई सटोरिया नहीं होता। वह जितना संभव है, उतना जानकर ही दांव लगाता है। वह जो भी शेयर खरीदे, उसके पीछे निष्पक्ष वऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में आप इंडेक्स फंड के ईटीएफ या म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीमों के ज़रिए परोक्ष रूप से निवेश कर सकते हैं। लेकिन सीधे निवेश करना है तो संभावनामय कंपनियां चुननी पड़ती हैं, पता करना पड़ता है कि कंपनी का भविष्य क्या हो सकता है। और, आप जानते ही हैं कि कोई भी, यहां तक कि कंपनी का प्रवर्तक भी कंपनी के बारे में सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकता। लेकिन बिना भविष्य का अंदाज़ा लगाए किसीऔरऔर भी

भारत जैसी संभावनाओं से भरी उभरती अर्थव्यवस्था में सम्पूर्ण शेयर बाज़ार या व्यावहारिक रूप से कहें तो निफ्टी-50 या सेंसेक्स-30 जैसे सूचकांकों के ईटीएफ में निवेश करना सदा के लिए होना चाहिए। ऐसा निवेश पांच, दस या बीस साल बाद तभी बेचकर मुनाफा निकालना चाहिए, जब खास ज़रूरत पड़ जाए। इनके बाहर कुछ ही कंपनियां होती हैं जिनमें निवेश सदा के लिए होता है। बाकी तमाम कंपनियों में किया निवेश ऐसा होता है कि लक्ष्य पूरा करतेऔरऔर भी