संकटग्रस्त विमानन कंपनी एयर इंडिया का पुनर्गठन किया जा रहा है और सरकार कंपनी में अतिरिक्त इक्विटी के तौर पर 1200 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। यह कहना है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का। यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल की पहली सालगिरह पर मंगलवार को जारी रिपोर्ट में प्रधानमंत्री ने कहा है कि एयर इंडिया चलाने वाली नेशनल एविएशन कंपनी आफ इंडिया (नासिल) का पुनर्गठन किया जा रहा है और सरकार ने कंपनी में 2000 करोड़ रुपए केऔरऔर भी

गुजरात के साणंद में करीब 2000 करोड़ का टाटा नैनो संयंत्र आ जाने से वहां जमीन-जायदाद की कीमतों में जबरदस्त इजाफा हुआ है। दो साल पहले तक वहां जमीन का भाव 800-1000 रुपए प्रति वर्ग गज था। अब यह 3500-4000 वर्ग गज हो गया है। अभी तक साणंद इलाके को तंबाकू की बेल्ट माना जाता रहा है। लेकिन अब यह दिल्ली के पास का गुडगांव बनता जा रहा है। शहर को कांडला पोर्ट से जोड़नेवाला राजमार्ग अभीऔरऔर भी

ग्रीस का संकट हमारे नीति-नियामकों को भी परेशान किए हुए है, लेकिन सभी एक स्वर से कहने में लगे हैं कि इसका भारत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। पहले यह बात वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और वित्त सचिव अशोक चावला बोल चुके हैं। अब रिजर्व बैंक के गर्वरन डी सुब्बाराव ने भी कह दिया है कि ग्रीस संकट के चलते भारत के बाह्य क्षेत्र के सामने कोई समस्या नहीं आएगी। सुब्बाराव मंगलवार को पुणे में रिजर्व बैंकऔरऔर भी

जीवन बीमा कंपनियों का धंधा चौचक चल रहा है। अप्रैल, 2010 में उन्होंने कुल 5746.33 करोड़ रुपए का प्रीमियम इकट्ठा किया है। यह रकम अप्रैल, 2009 के कुल 3601.58 करोड़ रुपए के प्रीमियम से 59.55 फीसदी अधिक है। देश में कुल 23 जीवन बीमा कंपनियां सक्रिय हैं। 22 निजी क्षेत्र की और एक एलआईसी। लेकिन अकेले एलआईसी बाकी 22 पर भारी है। अप्रैल 2010 में उसका प्रीमियम संग्रह 4173.69 करोड़ रुपए रहा है जो सारी बीमा कंपनियोंऔरऔर भी

इस समय पूंजी बाजार से रिटेल निवेशक या आम निवेशक कन्नी काट चुके हैं। सेकेंडरी बाजार या शेयर बाजार में उनका निवेश लगभग सूख चुका है। दूसरी तरफ, जो प्राइमरी बाजार कुछ साल पहले तक आम निवेशकों का पसंदीदा माध्यम बना हुआ था, वहा भी अब आईपीओ (शुरुआती पब्लिक ऑफर) व एफपीओ (फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर) में लोगबाग पैसे नहीं लगा रहे हैं। लगाएं भी तो कैसे। कमोबेश हर आईपीओ या एफपीओ लिस्ट होने के बाद इश्यू मूल्यऔरऔर भी

कोई आपसे पूछे कि भारतीय अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है तो आप बेझिझक बता सकते हैं कि यह अभी 44,64,081 करोड़ रुपए की है, वह भी तब जब इसमें से 2004-05 के बाद की मुद्रास्फीति या महंगाई के असर को निकाल दिया गया है। अगर सारा कुछ आज की कीमत के हिसाब से बोलें तो हमारी अर्थव्यवस्था का आकार 58,68,331 करोड़ रुपए का है। लेकिन हम महंगाई के असर को जोड़कर नहीं, हटाकर ही बात करते हैं क्योंकिऔरऔर भी

देश की आबादी करीब 118 करोड़ हो चुकी है। लेकिन हमारे सभी बैंकों में कुल बचत खातों की संख्या केवल 15 करोड़ है। ऐसा तब है जबकि भारत में दुनिया का सबसे बड़ा बैंकिंग तंत्र है जिसमें कुल करीब 79,000 शाखाएं व एटीएम वगैरह शामिल हैं। रिजर्व बैंक, नाबार्ड व राज्य सरकारों की तमाम कोशिशों के बाद 8.6 करोड़ घरों तक स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के जरिए बैंकिंग सेवा को पहुंचाया गया है। देश भर में बचतऔरऔर भी

हमारी दो-तिहाई खेती अब भी मानसून आधारित है। मौसम और मानसून खराब हुआ तो इन इलाकों की सारी फसल चौपट हो जाती है, किसान बरबाद हो जाते हैं। सरकार ने कहने को राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एनएआईएस) चला रखी है। मौसम आधारित फसल बीमा योजना (डब्ल्यूबीसीआईएस) भी है। इसके लिए मौसम के सही आंकड़ों का होना जरूरी है। लेकिन अभी स्थिति यह है कि देश में कुल 14.10 लाख हेक्टेयर जमीन में खेती की जाती है, जबकिऔरऔर भी

इस समय सरकार व स्टॉक एक्सचेंजों के पास निवेशकों की सुरक्षा के लिए लगभग 1600 करोड़ का फंड है। इसमें से कॉरपोरेट मामलात मंत्रालय के पास 500 करोड़, बीएसई के पास 432 करोड़, एनएसई के पास 353 करोड़ और क्षेत्रीय स्टॉक एक्सचेंजों के पास 300 करोड़ रुपए का फंड जमा है। इसके अलावा सेबी दोषी कंपनियों या व्यक्तियों से जो पेनाल्टी वसूल करती है वह भारत सरकार की समेकित निधि में चली जाती है। लेकिन इतने फंडऔरऔर भी

महंगाई पर काबू पाने की कीमत सरकार अब किसानों से वसूलने जा रही है। खेती की लागत बढ़ने के बावजूद वह इस बार खरीफ फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने नहीं जा रही है। धान का मूल्य किसानों को वही मिलेगा जो पिछले साल मिला था। जबकि दलहन के मूल्य में की गई वृद्धि नाकाफी है। जिंस बाजार में दलहन की जो कीमतें हैं, उसके मुकाबले सरकार ने एमएसपी लगभग एक तिहाई रखा है। सरकार केऔरऔर भी