अपनों में शायद ही कोई अपना मिले, जिसके नाम खुद को किया जा सके। परायों में तलाशोगे, दर-दर भटकोगे तो जरूर कोई न कोई मिल जाएगा, खुद को जिसके नाम कर निश्चिंत हो सकते हो।और भीऔर भी

दार्शनिक बंधु सदियों से इसी तर्क में उलझे हैं कि पहले अंडा आया कि मुर्गी। लेकिन विज्ञान बताता है कि पहले आया आरएनए – राइबो न्यूक्लीक एसिड जो एक साथ मुर्गी भी है और अंडा भी।और भीऔर भी

हर कोई सिर नीचे गाढ़कर चरे जा रहा है। जाल-जंजाल इतने कि जानी-पहचानी चीजों के अलावा और कुछ जानने की फुरसत नहीं। ऐसे में काम की चीज भी लोगों को भोंपू बजाकर सुनानी पड़ती है।और भीऔर भी

हमारा काम हमें विस्तार देता है। बड़ा काम करने के लिए उदार मन और सोच की जरूरत होती है। हर बड़े काम के साथ हमारा कद बढता है और हमारी सोच का दायरा भी और व्यापक हो जाता है।और भीऔर भी

जिसे हम देख-समझ नहीं पाते, उसे अज्ञात कह देते हैं। लेकिन समूची सृष्टि में कुछ भी अकारण नहीं है। हां, यह जरूर है कि हाथी अपनी पीठ नहीं देख सकता। उसी तरह हमारी भी निजी सीमाएं हैं।और भीऔर भी

जब आप खास होते हो तो लोग आपको देखते हैं। लेकिन जब आम होते हो तो आप सबको देखते हो। इसलिए जिन्हें भी दुनिया को सही से देखना-समझना है, उनके लिए आम बने रहना ही ज्यादा अच्छा।और भीऔर भी

सिर्फ अपने या अपनों के लिए कमाने से नौकरी होती है, बरक्कत नहीं होती। बरक्कत तब होती है, दौलत तब बरसती है, जब आप किसी सामाजिक संगठन, संस्था या कंपनी के लिए कमाते हो।और भीऔर भी

दिमाग की धमनभठ्ठी को धधकने दें। विचारों की आंधी को धौंकनी बना दें और आग्रहों-पूर्वाग्रहों के खर-पतवार को ईंधन। रक्ताभ ज्वाला में फिर निखरेगा कुंदन, शांत व सम्यक ज्ञान का कुंदन।और भीऔर भी

विचार को व्यक्ति से बांध कर देखना सही नहीं। ये विचार न तेरे हैं, न मेरे हैं। हम तो बस निमित्त हैं। विचार हमारे अंदर से निकलने के बाद स्वतंत्र हो जाते हैं। वे हमारी बपौती नहीं रह जाते।और भीऔर भी

दूसरों को अपने जैसा समझना पहले भी गलत था, आज भी गलत है। आप सच्चे हो, अच्छा है। लेकिन सामनेवाला इंसान नेवला है कि भेड़िया, गाय है कि गोजर – यह तो आपको देखना ही पड़ता है।और भीऔर भी