बड़प्पन देने का
जब तक हम देना नहीं शुरू करते, तब तक हमेशा छोटे बने रहते हैं। सिर्फ पाने की चाह हमें कमजोर व दीन-हीन बनाए रखती है। इससे निकलना है तो हमें बेधड़क देने का सिलसिला शुरू करना होगा।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
जब तक हम देना नहीं शुरू करते, तब तक हमेशा छोटे बने रहते हैं। सिर्फ पाने की चाह हमें कमजोर व दीन-हीन बनाए रखती है। इससे निकलना है तो हमें बेधड़क देने का सिलसिला शुरू करना होगा।और भीऔर भी
इस सृष्टि में अनंत अदृश्य शक्तियां सक्रिय हैं। वे इच्छाधारी हैं और खुद को जितना चाहें, उतना गुना कर सकती हैं। आहट मिलते ही वे मनोयोग व लगन से काम में लगे लोगों की मदद को दौड़ पड़ती हैं।और भीऔर भी
पैसा रिश्तों में दरार नहीं डालता। पैसा तो असली रिश्तों की पहचान कराता है। अगर कोई आपके पैसे खा जाए तो समझ लीजिए कि वह आपका असली दोस्त कभी नहीं था। बस हेलो-हाय, बाय-बाय था।और भीऔर भी
बदलाव शाश्वत है। इसलिए दुख भी शाश्वत है क्योंकि बदलाव से यथास्थिति में मौज कर रहे लोगों को दुख होता है। बदलने वाले भी कष्ट पाते हैं। लेकिन नए की भावना उनकी सारी पीड़ा हर लेती है।और भीऔर भी
ट्यूब पर कठोर टायर न लगाया जाए तो गाड़ी चल नहीं सकती। कछुए की कठोर खोल न हो, शाही के लंबे काँटे न हों तो कोई भी उन्हें खा जाए। इसी तरह समाज में बहुत सीधा होना भी अच्छा नहीं।और भीऔर भी
शेर चालाकी करता है, लेकिन लोमड़ी चालाक होती है। यह फर्क हमें इंसानों के बीच भी समझना चाहिए। जिनका मूल स्वभाव ही चालाकी हो, उनसे कोई दूसरी अपेक्षा करना खुद को धोखे में रखना है।और भीऔर भी
सहजता का ही दूसरा नाम समाधि है। चालाकी हमें असहज बनाती है। लेकिन बुद्धि से हम हर चालाकी को काटकर सहज बन सकते हैं। इतने सहज कि लोगों की चालाकी पर हमें गुस्सा नहीं, हंसी आएगी।और भीऔर भी
अलग-थलग कोने में बैठकर ज्ञान बघारना, जुमले उछालना और फतवे फेंकना बड़ा आसान है। लेकिन सत्ता, शोहरत व समृद्धि की जंग में पहुंचते ही ऐसे लोग लहूलुहान चूजों की तरह भाग खड़े होते हैं।और भीऔर भी
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