ज्ञान का सुख
जीने की चाह में मरे जा रहे हैं। अस्सी साल, नब्बे साल, सौ साल। इत्ता जीकर क्या करोगे बापू? असली सुख तो पाया नहीं! जाना ही नहीं कि हमारे अंदर-बाहर जो भी हो रहा है, वो हो क्यों रहा है असल में।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
जीने की चाह में मरे जा रहे हैं। अस्सी साल, नब्बे साल, सौ साल। इत्ता जीकर क्या करोगे बापू? असली सुख तो पाया नहीं! जाना ही नहीं कि हमारे अंदर-बाहर जो भी हो रहा है, वो हो क्यों रहा है असल में।और भीऔर भी
निष्काम कर्म जैसा कुछ नहीं होता। हर काम के पीछे किसी न किसी फल की कामना होती है। काम में छल तब पैदा होता है जब पेड़ लगाने का मकसद फल नहीं, कुछ और होता है। यह समाज की देन है।और भीऔर भी
बच्चा जन्मता है तो आदिम होता है। फिर घर-समाज की उंगली पकड़ लाखों सालों का सफर चंद सालों में पूरा करता है, अनगिनत जन्मों को पार करता है। यह जन्म तो समझदार होने के बाद शुरू होता है।और भीऔर भी
पुराने का अपना चुंबकीय क्षेत्र व गुरुत्व है। नया पुराने के ही भीतर जन्मता है, पनपता नहीं। इसलिए असंतोष को दिल में रखकर पुराने में ही कोई कोना पकड़ लेनेवाले लोग नए का सृजन नहीं कर पाते।और भीऔर भी
जो लोग आत्म-मुग्ध होते हैं, भगवान की जरूरत उन्हें पड़ती हैं और जो अपने से मुक्त हैं, उन्हें गुरु की। भगवान तो अपनी छाया है। उससे क्या डरना और क्या पाना? हां, गुरु जरूर हमें बहुत कुछ देता है।और भीऔर भी
यहां से वहां तक समुद्र। लहरों के बीच में हम। गले तक पानी। धरती नजर ही नहीं आती। कितना घबराते हैं हम! लेकिन समुद्र की बूंदें तो लहरों के साथ कुलांचे मारती हैं। हम भी तो बूंद ही हैं जन समुद्र की।और भीऔर भी
बस एक छाप, अनुभूति या आत्मा भर बची रह गई। क्या करूं उसका? महसूस कर सकता हूं पर देख नहीं सकता, छू नहीं सकता। शब्दों के शरीर में ढाल नहीं सका तो सब कुछ रहते हुए भी कुछ नहीं रहा।और भीऔर भी
कुर्सी पकड़ते ही कुर्सी आपको जकड़ लेती है। उससे निकली लौह-लताएं आपको लपेट लेती हैं। आप इंसान से सत्ता के पुर्जे बन जाते हो और आपकी चमडी सीमेंट जैसी सख्त व संवेदनहीन हो जाती है।और भीऔर भी
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