सबका बनने की शर्त
जब आप सबका बनना चाहते हो तो अपना सारा कुछ उसके अधीन कर देना चाहिए। ध्यान रखें कि सबका बनने की चाह और अपना कुनबा अलग चलाने की कोशिश आपको कहीं का नहीं छोड़ती।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
जब आप सबका बनना चाहते हो तो अपना सारा कुछ उसके अधीन कर देना चाहिए। ध्यान रखें कि सबका बनने की चाह और अपना कुनबा अलग चलाने की कोशिश आपको कहीं का नहीं छोड़ती।और भीऔर भी
राजनीतिक आंदोलन में व्यक्ति व्यक्ति नहीं, बल्कि सामूहिक भावनाओं का प्रतीक होता है। ऐसे में व्यक्ति की खामियां निकालने वाले लोग अपनी नादानी में जनता नहीं, सत्ता के पाले में जा खड़े होते हैं।और भीऔर भी
सजग बु्द्धिजीवी मानव समाज का स्नायुतंत्र हैं। वे समाज को दिशा देनेवाली विचार-श्रृंखला को बनाते और बढ़ाते हैं। जो समाज बुद्धिजीवियों को मुक्त माहौल नहीं दे पाता, वह पथ-भ्रष्ट हो जाता है।और भीऔर भी
व्यक्ति की नैतिकता हो सकती है। लेकिन सरकारों की कोई नैतिकता नहीं होती। सत्ता की चंडाल चौकड़ी को बचाना ही उसका चरित्र है। हां, वह अवाम की निगाह में जरूर नैतिक दिखना चाहती है।और भीऔर भी
योग की साधना जीवन से हटकर नहीं की जा सकती। हमें योग का अभ्यास जीवन से मुक्ति पाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को पूर्णता से जीने के लिए करना चाहिए। गीता तक में यही बात कही गई है।और भीऔर भी
हमारे लिए क्या अच्छा है क्या बुरा, इस पर हम अक्सर दूसरों की राय पर चलते हैं जिससे भ्रांति ही उत्पन्न होती है। हमें अपना फैसला खुद करना होगा। तभी हम सही काम को सही ढंग से कर पाएंगे।और भीऔर भी
योग महज कसरत नहीं, बल्कि कर्म में कुशलता का नाम है। हमारे जीवन का बहुत बड़ा भाग इसलिए व्यर्थ चला जाता है क्योंकि या तो हम गलत काम करते हैं या फिर सही काम को गलत ढंग से करते हैं।और भीऔर भी
यूं तो हर दिन नया जन्म है। फिर खुद अपना जन्म दिन क्या मनाना? हां, दूसरे आपका जन्म दिन मनाएं, तब कोई बात है। वैसे, दूसरों के लिए भी आपका जन्म दिन अपनी खुशियों का बहाना होता है।और भीऔर भी
अगर कोई व्यक्ति, संस्था या समाज समस्याओं से जूझने के बजाय उनके साथ रहना सीख लेता है तो उसका विकास अवरुद्ध हो जाता है। समस्याएं तो दरवाजे हैं जिन्हें खोलने पर नई राहें निकलती हैं।और भीऔर भी
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