पत्थर से लेकर नेता व अभिनेता तक में प्राण-प्रतिष्ठा हम्हीं करते हैं। फिर उन्हें भगवान बनाकर खुद पिद्दी बन जाते हैं। अरे! अपनी आस्था को बाहर नहीं, अंदर फेकिए। तब देखिए उसका असर और असली प्रताप।और भीऔर भी

जब तक माया है, तभी तक भगवान है। माया के हटते ही भगवान भी उड़न-छू। तब हमें उस विराट सत्ता की अनुभूति होती है जो अंदर-बाहर हिलोर मार रही है और दुनिया का विराट छल भी तब बेपरदा हो जाता है।  और भीऔर भी

मौत से क्या डरना! वह तो किसी पल आएगी और हाथ पकड़कर साथ ले जाएगी। डरना तो जिंदगी से चाहिए जिसे पल-पल जीना पड़ता है, संभालना पड़ता है। जहां जरा-सी चूक पूरी जिंदगी को नरक बना सकती है।और भीऔर भी

केवल विज्ञान ही निरेपक्ष और व्यापक समाज के हित में है। बाकी महान से महान विचार भी निरपेक्ष नहीं होते। उसमें किसी का हित तो किसी का अहित होता है। यह दिखता नहीं, पर देखना जरूरी है।और भीऔर भी

हम प्रकृति से बने हैं। प्रकृति के सामने अक्सर बेबस हो जाते हैं। लेकिन समाज के सामने बेबसी बकवास है। समाज को हमने बनाया है तो इसे ठोंक-पीटकर बराबर दुरुस्त करते रहने का काम भी हमारा है।और भीऔर भी

सब कुछ गोल है तो देख पाने की सीमा है। पर फायदा यह है कि आगे क्या होनेवाला है, इसका आभास पहले ही हो जाता है। सूरज की लालिमा बाद में आती है। रात की कालिमा उससे पहले ही छंटने लगती है।और भीऔर भी

ज्ञान अगर कर्म की सेवा न करे तो वह अपने अहम को संतुष्ट करने का साधन बनकर रह जाता है। दरअसल हर शिक्षा, विद्या या ज्ञान का काम यही है कि वह हमारे कर्मजगत की राहों को साफ-सुथरा बना दे।और भीऔर भी

संख्याएं चलाती हैं हमारी जिंदगी। क्या करेंगे, क्या पाएंगे – सारा हिसाब करती हैं संख्याएं। समय तक को बांधती हैं संख्याएं। हम इनसे भाग नहीं सकते। हां, उन्हें उंगलियों के पोरों पर जरूर रख सकते हैं।और भीऔर भी

हमारी जितनी भी ऊर्जा है, सारी की सारी उधार की है। इसे किसी न किसी दिन लौटाना ही पड़ता है। अपने अंदर लेकर बैठे रहे तो कभी चैन नहीं मिलता क्योंकि कर्ज लौटाए बिना उऋण कैसे हो सकते हैं हम?और भीऔर भी

उचाट रहने से सच तक नहीं पहुंचा जा सकता है, पंडित नहीं बना जा सकता है। इसके लिए जुड़ना जरूरी है, प्रतिबद्धता जरूरी है, प्रेम जरूरी है, डूबना जरूरी है। निर्लिप्त रहकर ज्ञानवान नहीं बना जा सकता।और भीऔर भी