इंसानों की बस्ती में हम या तो अपने या दूसरों के कर्मों का नतीजा भुगतते हैं। यहां छिपकर कहीं कोई खुदा नहीं बैठा जो हमारी सदिच्छाओं को पूरा करता रहे या बिना किसी बात के हमें दंडित करता रहे।और भीऔर भी

हफ्ते के सातों दिन किसी न किसी देव को समर्पित हैं जो हमारे ही अंतर्निहित तत्वों के नाम हैं। इनमें से सबसे प्रखर देव सूर्य और शनि हैं। लेकिन इन दोनों ही दिनों हम निढाल पड़े जम्हाई ले रहे होते हैं!और भीऔर भी

इंसान की कोई भी रचना तब तक निष्प्राण रहती है जब तक उसे व्यापक समाज स्वीकार नहीं करता। लेकिन स्वीकृत होते ही वह रचनाकार की मंशा से अलग एक स्वतंत्र सत्ता हासिल कर लेती है।और भीऔर भी

गुरुत्वाकर्षण इतना सहज है कि सब धरती से चिपके आराम से चलते रहते हैं। जब उड़ना होता है तभी इस चुम्बक का अहसास होता है। इस ज्ञान के लिए उड़ना नहीं तो कम से कम उड़ने की कोशिश जरूरी है।  और भीऔर भी

भाषण लफ्फाजी में कब बदल जाते हैं, इसका पता बोलनेवालों को नहीं चलता, लेकिन सुननेवाले ताड़ लेते हैं। नेताओं को मालूम हो कि क्रिया से दूर ज्ञान और करनी से दूर कथनी ज्यादा नहीं चलती।और भीऔर भी

अमूमन कुछ लोग लिखते हैं, बहुत से लोग पढ़ते हैं। लेकिन इधर लिखनेवाले बहुत हो गए हैं और पढ़नेवाले कम तो इसका मतलब यही है कि रीतापन इतना ज्यादा है कि अब पढ़नेवाले ही कलम उठाने लगे हैं।और भीऔर भी

अपने घर-परिवार और अपनी नजर में तो हर कोई मूल्यवान होता है। लेकिन असली बात यह है कि समाज की नजर में आपका मूल्य क्या है क्योंकि उसी से आपकी सुख-समृद्धि और चैन का फैसला होता है।और भीऔर भी

नई धारणाएं पुराने शब्दों में नहीं बांधी जा सकतीं। वे जीवन में जिस रूप, जिस भाषा में आएं, उन्हें वैसे ही स्वीकार करना होगा। नया हमारे हिसाब से नहीं ढलेगा। हमें ही उसके हिसाब से ढलना होगा।और भीऔर भी

इस दुनिया में परिवार, प्यार व चंद दोस्तों के अलावा हर कोई पहले अपना फायदा देखता है। इक्का-दुक्का अपवाद संभव हैं। लेकिन फाइनेंस की दुनिया में यह अपवाद नहीं, नियम है। इसलिए पूरा संभलकर।और भीऔर भी

विचार अगर अस्पष्ट हैं, सोच अगर ठंडी है तो इसकी एकमात्र वजह यह है कि हमारी पक्षधरता साफ नहीं है। पहले तय करें कि आप किस खेमे में हैं। फिर देखिए कि आपके विचार कितने प्रखर हो जाते हैं।और भीऔर भी