दलाल या दलित
तंत्र औपनिवेशिक किस्म का हो तो सत्ता से बाहर के सारे लोग या तो दलाल होते हैं या दलित। दलित कोई जाति नहीं। सवर्ण, अवर्ण कुछ नहीं। विकास के अवसरों से जो भी वंचित हैं, वे सभी दलित हैं।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
तंत्र औपनिवेशिक किस्म का हो तो सत्ता से बाहर के सारे लोग या तो दलाल होते हैं या दलित। दलित कोई जाति नहीं। सवर्ण, अवर्ण कुछ नहीं। विकास के अवसरों से जो भी वंचित हैं, वे सभी दलित हैं।और भीऔर भी
हम व्यक्ति या वस्तु को जानकर नहीं, मानकर चलते हैं। परखने से पहले ही उन्हें किसी खांचे में कस लेते हैं और उसके हिसाब से अपेक्षाएं पाल लेते हैं। ऐसे में धोखा खाते हैं तो इसमें दोष हमारा भी है।और भीऔर भी
24 घंटे में 8 घंटे सोना और बाकी 16 घंटा जगना। दिनचर्या का यही चक्र है। लेकिन सवाल यह है कि जगने के दौरान हम चैतन्य कितने घंटे रहते हैं? इसी से हमारी मानव चेतना का स्तर तय होता है।और भीऔर भी
कितने मासूम हैं हम कि अपनी ही कहानी देखकर रो पड़ते हैं और सामनेवाले की तारीफ में कह डालते हैं, वाह! क्या दिखाया है। कब रुकेगा हमारी कथा हम्हीं को दिखाकर रुलाने का यह निर्मम सिलसिला?और भीऔर भी
लोगों को जो जरूरत है और लोग जो चाहते हैं, हम उन्हें वही सिखा सकते हैं। साथ ही किसी को कुछ भी सिखाने से पहले जरूरी है यह जानना कि हम खुद दूसरों से कितनी सारी बातें सीख सकते हैं।और भीऔर भी
ये सरकार भी बड़ी जालिम चीज़ है! कहने को सबकी संरक्षक है, पालनहार है। मगर जब कंगाली में फंसते हो तो पूछती तक नहीं और जैसे ही आप कहीं से कमाई कर लेते हो, फौरन टैक्स वसूलने आ जाती है।और भीऔर भी
वे रेखाएं या आहट देखकर भविष्य बांचने का काम औरों का नहीं, अपना भविष्य संवारने के लिए करते हैं। भविष्यवाणी करना उनके पापी पेट का सवाल है। इससे हमें ढाढस के सिवा कुछ नहीं मिलता।और भीऔर भी
विचार किसी लता की तरह हैं जिन्हें अगर बाहर का कोई सहारा न मिले तो उनका बढ़ना रुक जाता है। इसलिए विचारों को बराबर व्यवहार के धरातल पर कसते रहना चाहिए। नहीं तो बे-काम हो जाते हैं।और भीऔर भी
हम सभी में उससे कहीं ज्यादा सामर्थ्य और संभावना होती है, जितना हम सोचते हैं। बस जरूरत है इसे निखारने की। इसके लिए चाहिए अटूट आत्मविश्वास और लड़कर हासिल करने का जुनून।और भीऔर भी
समय हथेलियों से फिसलती रेत की तरह निकलता जाता है। हाथ मलते रह जाते हैं हम कि इस साल भी खास कुछ नहीं कर पाए। तय करें कि नए साल के हर पल का तेल निकाल लेंगे, निरर्थक नहीं जाने देंगे।और भीऔर भी
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