लगे रहने से भगवान के सिवा सब कुछ मिल जाता है। भगवान भी इसलिए नहीं क्योंकि उसे खोजते-खोजते तो हम अपनी ही गुप्त गुफाओं में पहुंचकर अपने ही भव्य व विराट स्वरूप के सामने आ खड़े होते हैं।और भीऔर भी

किसी गिरते बूढ़े को उठाकर तो देखो! सड़क पर गिरे पड़े किसी घायल को अस्पताल पहुंचाकर तो देखो! घर से भागे किसी बच्चे को आसरा देकर तो देखो! जानवर से उठकर कभी इंसान बनकर तो देखो!और भीऔर भी

इंसान अपनी मंज़िल से उतना ही दूर है, जितना दूर वो अपने कुतूहल से है। जानने की इच्छा न हो, नए से नया देखने का कौतूहल न हो तो इंसान चलता ही नहीं; और, चले बिना मंजिल भला किसे मिलती है!और भीऔर भी

मां के गर्भ में खास वक्त तक पता नहीं चलता कि हम पुरुष बनेंगे या स्त्री। उसी तरह किसी संगठन में अल्प विकसित अवस्था तक हमारा खेमा तय नहीं होता। पर हैसियत बनते ही हम पक्षधर बन जाते हैं।और भीऔर भी

किसी की हारी-बीमारी या शारीरिक विकलांगता हम नहीं दूर कर सकते। लेकिन समाज की व्यवस्था को इतना न्यायसंगत जरूर बना सकते हैं कि हर किसी को उसका वाजिब हक मिले और लूटखसोट बंद हो।और भीऔर भी

भगवान के भ्रमजाल में फंसानेवाला शख्स सच्चा गुरु नहीं हो सकता क्योंकि भगवान तो अपनी कमियों-कमजोरियों को पूरा करने के लिए खुद हमारे द्वारा समय व स्थान से हिसाब से गढ़ी गई छवि है।और भीऔर भी

जीने के दो ही तरीके हैं। एक, दिए हुए हालात को जस का तस स्वीकार कर उसी में अपनी कोई जगह बना ली जाए। दो, हालात से ऊपर उठकर नई संभावनाओं को तजबीज कर उन्हें मूर्त रूप दे दिया जाए।और भीऔर भी

हमारा तारणहार, हमारा मुक्तिदाता कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अंदर बैठा है। वह प्रकृति का वो जटिल समीकरण है, उसके तत्वों का वो विन्यास है जो हमसे पूछे बिना हमें चलाता-नचाता रहता है।और भीऔर भी

दलित के नाम पर आप क्यों सत्ता पाना चाहती हैं बहनजी? जनता के नाम पर आप सरकार में क्यों आना चाहते हैं नेताजी? जनता पर यूं मुफ्त कृपा बरसाने के पीछे की असली नीयत तो खोलिए जनाब!और भीऔर भी

हमें अपने इर्दगिर्द हमेशा ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो हमारी आंखों में आंखें डालकर सच बोल सकें। खासकर तब, जब हमारे दिन खराब चल रहे हों और हम बार-बार अपने लक्ष्य से चूक रहे हों।और भीऔर भी