अंधविश्वासी व्यक्ति को अपार धन के बावजूद कभी भी वो खुशी नहीं मिल सकती है जो किसी उन्मुक्त मन को मिलती है। हर खुशी का स्रोत प्रकृति है और प्रकृति उसे ही देती है जो उससे डरता नहीं, दो-दो हाथ करता है।और भीऔर भी

अकेले बस मरा जा सकता है, जिया नहीं जा सकता। जीना और काम तो हमेशा समूह में होता है, टीम में होता है। काम टीम करती है। श्रेय, नाम और वाहवाही नेता को मिलती है। लेकिन इसे सही तो नहीं कहा जा सकता।और भीऔर भी

शरीर जरूरत से ज्यादा नहीं पचा सकता। इसी तरह कोई भी शख्स अपने पास जरूरत से बहुत-बहुत ज्यादा नहीं रख सकता। उसे अतिरिक्त संपदा को सामाजिक स्वरूप देना ही पड़ता है। यही प्रकृति का नियम है।और भीऔर भी

प्रकृति में कुछ भी बेकार नहीं जाता। खाद बन जाता है। इसी तरह समाज में जो भी खुद को मिसफिट पाते हैं, वे असल में कल के सृष्टि बीज होते हैं। इन्हें हालात से घबराने के बजाय कल की तैयारी में जुट जाना चाहिए।और भीऔर भी

जीवन की राहों पर अनिश्चितता है, अराजकता नहीं। शिक्षा व संस्कार हमें इन राहों पर चलने का ड्राइविंग लाइसेंस दिलाते हैं। हमारा आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। बाकी, अनिश्चितता का थ्रिल हमारा उत्साह बरकरार रखता है।और भीऔर भी

जो चला गया, उसका गम क्या? वह चाहे हादसा था या प्रकृति का चक्र, हम उसे रोकने की बात तो दूर, छू तक नहीं सकते। इसलिए जिसका जितना साथ है, हंस बोल कर ही बिताना चाहिए ताकि कोई मलाल न रहे।और भीऔर भी

हाथ पकड़कर खींचने से कोई नहीं जुड़ता। वो तो अंदर की एक ध्वनि होती है जिसे सुनते ही लोग दौड़े चले आते हैं। हाथी एक खास आवाज धीरे से निकालता है और दस किलोमीटर दूर तक के हाथी खिंचे चले आते हैं।और भीऔर भी

कुछ भी स्थाई नहीं। न दुख, न सुख। पौधे पर एक पत्ती इधर तो एक पत्ती उधर। छोटा से छोटा कण भी अपनी धुरी पर अनवरत घूम रहा है। इसलिए अभी कृष्ण पक्ष है तो शुक्ल पक्ष अगला है। यह लीला नहीं, नियम है।और भीऔर भी

आप अपनी बनाई चीज पर फिदा हैं। आपकी निगाह में बहुत कीमत है उसकी। लेकिन इससे क्या होता है? कीमत तो दूसरे की निगाह में होनी चाहिए। दूसरा ही तय करेगा कि आपकी चीज की औकात क्या है, आप नहीं।और भीऔर भी

असत से सत की ओर, अंधेरे से उजाले की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर। सब प्रार्थना है। यथार्थ यह है कि हम हर समय असंतुलन से संतुलन की ओर बढते रहते हैं। लेकिन पूर्ण संतुलन तो मृत्यु पर भी नहीं मिलता।और भीऔर भी