भरोसे का टूटना सबसे खतरनाक होता है। सरकार की बातों पर विश्वास ही न रहे तो वो चाहे जो बकती रही, अवाम के बीच निराशा गहराती जाती है। इस समय देश का यही हाल है। चारण, भांट और दलाल ही देश का हाल बता रहे हैं। सच इस वक्त नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गया है। सत्ता के चारण-भांट कड़वी हकीकत को कैसे चमकीला बनाकर पेश करते हैं, इसका एक नमूना पेश है। देश के आम लोगों को निर्वाह के लिए ज्यादा से ज्यादा कर्ज लेना पड़ रहा है। रिजर्व बैंक के डेटा के मुताबिक वित्त वर्ष 2011-12 में हाउसहोल्ड या आम घरों पर चढ़ा ऋण जीडीपी का 15.9% था। यह जून 2024 तक जीडीपी के 42.9% पर पहुंच गया। इन 12 सालों में ऋण की रकम ₹7.3 लाख करोड़ से छह गुना बढ़कर ₹43 लाख करोड़ पर जा पहुंची, जबकि घरेलू बचत दर 47 साल के न्यूनतम स्तर जीडीपी के 5.1% तक गिर गई। लेकिन पहले मोदी की कृपा से रिजर्व बैंक के गवर्नर और अभी पीएमओ में उनके प्रधान सचिव बने शक्तिकांत दास कहते हैं कि भारत का हाउसहोल्ड ऋण जीडीपी का 42.6% है, जबकि चीन में यह 59.6%, मलयेशिया में 69.9% और थाईलैंड में 87.7% है। मोदी के दास ने यह नहीं बताया कि थाईलैंड तक की प्रति व्यक्ति आय हमसे तीन गुनी है। अब बुधवार की बुद्धि…
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