शेयर बाज़ार के संजीदा निवेशकों को हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि वे यहां ट्रेडिंग पर दांव लगाने नहीं, बल्कि धैर्य से दौलत बनाने आए हैं। ट्रेडिंग का टेम्परामेंट अलग होता है और निवेश का अलग। दोनों का घालमेल नहीं करना चाहिए। किसी भी शेयर को अपना अंतर्निहित मूल्य हासिल करने के लिए दो-तीन साल देने ही पड़ते हैं। दूसरे, शेयर बाज़ार में दौलत सटीक व शानदार अनुमान से नहीं, बल्कि बड़ी गलतियों से बचकर समझदार फैसले करनेऔरऔर भी

मोदीराज के दस साल में सरकार का बजट जीडीपी की गति से ज्यादा बढ़ा है। मतलब कि सरकार ने अपने तंत्र और स्कीमों पर जितना खर्च किया, उसका लाभ देश की अर्थव्यवस्था को उतना नहीं मिला। इसमें भी देखना ज़रूरी है कि सरकार ने अपना बजट किस-किस मद में ज्यादा बढ़ाया है। लेकिन पहले यह जान लें कि जिन दस सालों में जीडीपी 10.02% की नॉमिनल दर से बढ़ा, उसी दौरान औसत भारतीय की कमाई 8.90% औरऔरऔर भी

भविष्य में कभी कोई मोदी सरकार के कर्मों का हिसाब करेगा, खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कथनी और करनी के अंतर का लेखा-जोखा करेगा तो उनकी राजनीतिक दक्षता, कौशल व धूर्तता की दाद देने से बच नहीं सकता कि कैसे इतने झूठ व पाप के बावजूद कोई शख्स जनमत या तंत्र को मैनिपुलेट करके तीसरी बार दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सत्ता हासिल कर सकता है। मोदी ने आते ही ‘मिनिमम गवर्मेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ का नाराऔरऔर भी

मोदी सरकार यकीनन राजनीति में येनकेन प्रकारेण सत्ता पर अजगरी गिरफ्त बनाए हुए है। लेकिन अर्थव्यवस्था में वो अंधे धृतराष्ट्र की गति को प्राप्त हो चुकी है। वो अपने मुठ्ठी भर प्रिय कॉरपोरेट समूहों के स्वार्थ में इतनी अंधी हो चुकी है कि बाकी उसे कुछ नहीं दिख रहा। अर्थव्यवस्था के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं उत्पादन या मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ाना और लोगों की क्रय-शक्ति या खपत के आधार को बढ़ाना। देश में खपत का मौजूदाऔरऔर भी