बिजनेस की परख हो तभी करें निवेश
हर कोई बेहतरीन खाना नहीं बना सकता, लेकिन अच्छे खाने की तारीफ तो हर कोई कर सकता है। इसी तरह हर कोई अच्छा बिजनेस नहीं चला सकता। लेकिन कौन-सा बिजनेस अच्छा है, कहां मार्जिन ज्यादा है, संभावना अधिक है, यह बात दिमाग पर थोड़ा-सा ज़ोर लगाकर कोई भी समझ सकता है। शेयर बाज़ार में निवेश करना है तो यही समझना पड़ता है। हम बस इतना कर लें तो बाकी काम कंपनी कर डालेगी। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी
मोमबत्तियां बताती हैं समूह का मन
एक इंसान की भावनाएं, उसका मनोविज्ञान पढ़ना बहुत मुश्किल नहीं। लेकिन जहां लाखों लोगों की भावनाएं जुड़ी हों, वो भी दया, माया या करुणा जैसे आदर्श नहीं, बल्कि धन जैसे ठोस स्वार्थ से जुड़ी हों, जहां देशी ही नहीं, विदेशी निवेशक तक शामिल हों, वहां समूह के मनोविज्ञान को पढ़ना बहुत मुश्किल है। फिर भी हम बाज़ार में इन्हें कैंडलस्टिक से पढ़ते हैं और यह रिवाज़ करीब 300 साल पुराना है। अब पढ़ते हैं शुक्र का भाव…औरऔर भी
बड़ा आत्मघाती होता है अतिविश्वास
वॉरेन बफेट जैसे धुरंधर तक हमेशा सही नहीं होते तो हम-आप किस खेत की मूली हैं। अक्सर लगातार ट्रेड सही पड़ने के बाद हम बम-बम करने लगते हैं। गुमान हो जाता है कि हम गलत नहीं हो सकते। घाटा मारता है तो उस ट्रेड से निकलने के बजाय पोजिशन बढ़ाते जाते हैं। होश तब आता है जब सारा मुनाफा उड़नछू हो जाता है। याद रखें, बाज़ार में अतिविश्वास हमेशा आत्मघाती होता है। चलिए, परखें गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी
सर्जन खून देख बेहोश तो नहीं हुआ!
बहुचर्चित कहावत है कि स्टॉप-लॉस लगते ही जिस ट्रेडर का दिल बैठ जाए, उसकी हालत उस सर्जन जैसी है जो ऑपरेशन टेबल पर मरीज का खून देखते ही बेहोश हो जाए। यहां सारा खेल प्रायिकता है। अच्छे से अच्छे ट्रेड के भी गलत होने की प्रायिकता 20-25% हो सकती है। घाटा ज्यादा न लगे, इसीलिए स्टॉप-लॉस की व्यवस्था की गई है। कुछ लोग तो स्टॉप-लॉस को स्टॉक ट्रेडिंग की लागत बताते हैं। अब चलाएं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी






